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दिनांक 7 सितंबर, 1936 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर किसी काम से सुबह की एक्स्प्रेस गाड़ी से पुणे गए हुए थे। दोपहर 12 बजे जब यह एक्स्प्रेस गाड़ी पुणे पहुंची, उस समय स्टेशन पर उनका अस्पृश्य नेताओं की ओर से स्वागत किया गया। उनके स्वागत के लिए मे. सुभेदार, आर. एस. घाटगे, राजाराम भोले, डी. जी. जाधव, आर. के. कदम, सुभेदार, दुबे, सावंत, मातंग समाज के श्री. लांडगे आदि लोग उपस्थित थे। मातंग समाज की ओर से फूलों की माला और गुलदस्ते अर्पण करने, फोटो खिंचवाने आदि के काम पूरे होने के बाद बाबासाहेब अपने निजी कामों के लिए कहीं गए। बाद में करीब डेढ़ बजे के आसपास उन्हें डी. सी. मिशन में लाया गया। उस समय उनके साथ डॉ. सोलंकी भी थे। डी. सी. मिशन में आगामी असेंबली चुनावों के बारे में सोच-विचार के लिए पुणे के सौ-डेढ़ सौ नेता और अन्य लोग इकट्ठा हुए थे। सबके साथ इस बारे में चर्चा के बाद अस्पृश्यों के लिए आरक्षित जगहों के लिए स्वतंत्र लेबर पार्टी की ओर से भेजे गए उम्मीदवारों के नामों के बारे में डॉ. अम्बेडकर साहब ने अपना पहला चुनावी भाषण किया। उन्होंने अपने इस भाषण में कहा,
”प्रिय बंधुओं,
मैंने जिन उम्मीदवारों के नाम चुने हैं उनके बारे में जो थोड़ी बहुत आलोचना हो रही है, उसके बारे में मुझे न दुख है न आश्चर्य। क्योंकि, इन सभी मतों में कोई बेहद प्रतिकूल मत मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। इससे मैं कह सकता हूं कि उम्मीदवारों का मैंने जो चयन किया है वह समाज को पसंद है ऐसा कहा जा सकता है। जिन उम्मीदवारों का मैंने चुनाव किया है उनमें कोई मेरे रिश्तेदार नहीं हैं, न मेरा कोई चाचा है, न बेटा है, न दामाद है और न मेरे कोई समधी हैं। सभी तरह से सोच कर मैंने तीन कसौटियां लगाईं और इन कसौटियों पर खरा उतरने वालों का ही चुनाव किया गया है। पहली कसौटी है अंग्रेजी भाषा का उŸाम ज्ञान। क्योंकि वहां सभी काम अंग्रेजी में ही चलेगा। अपने जिले की, तहसील की जो शिकायतें होंगी, वे असेंबली में अंग्रेजी में पूछनी होंगी। इसीलिए उम्मीदवार को अंग्रेजी भाषा आना जरूरी है। दूसरी बात, उम्मीदवार जवान होना चाहिए। बूढे़ लोगों को वहां पालखी में बिठा कर ले नहीं जाना है। असेंबली का काम जब चल रहा हो, तब अगर किसी उम्मीदवार के नाम किसी गांव से बेहद जरूरी काम का तार आए तो, और अगर
* जनता : 12 सितम्बर, 1936