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तरह यह दलील कि सरकारी नौकरी फिजूल है, न केवल असत्य है, वरन् दिग्भ्रमित करने वाली है। कारण यह है कि ब्राह्मणों ने सरकारी नौकरियों का मोह छोड़ा ही नहीं है। वे पहले की तरह ही उससे चिपके हुए हैं। इसलिए हम उनके इस झूठे और अप्रामाणिक तर्कजाल में न फंसें।
सज्जनों, इस अवसर पर एक खेदजनक बात का स्मरण कराना जरूरी हो रहा है। मैंने पहले कहा है कि इस प्रदेश में सूबेदारों और जमादारों की काफी तादाद थी और उन्होंने कई अच्छे काम किए लेकिन एक काम नहीं किया वह अगर किया होता तो हम सब के काम आता। वह काम यह है कि अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दी। सज्जनों ये लोग गरीब नहीं थे। उनके वक्त के हिसाब से उन्हें अच्छी पेंशन मिलती थी। वे यदि चाहते तो अपने बच्चों को बी.ए. या एम.ए. तक पढ़ा सकते थे। इसका क्या नतीजा होता इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। ये पढ़े हुए लड़के आज मामलातदार, कलेक्टर, मजिस्ट्रेट आदि पदों तक पहुंच गए होते तो आज सारे अस्पृश्य समाज के लिए वे मजबूत सहारा बनते। उनकी छत्रछाया में हमारा विकास होता। लेकिन ऐसा न होने के कारण हम धूप में झुलस रहे हैं। मेरी यह दृढ़ धारणा है कि जब तक हम अपने लिए सुरक्षित छांव (छत) तैयार नहीं करते तब तक हमारी प्रगति नहीं हो सकती। यह छांव सफेदपोश पेशों को अपनाकर सरकारी नैकरियों में भागीदारी हासिल किए बगैर नहीं बन सकती। इसलिए मैं आप सबसे यह अनुरोध कर रहा हूं कि आपको पहले उच्चशिक्षा की तरफ ध्यान देना चाहिए। एक लड़का बीए होने से अस्पृष्य समाज को जैसा सहारा मिलेगा वैसा एक हजार बच्चों के चौथी पास होने से नहीं होगा। मैं नहीं कहता कि प्राथमिक शिक्षा को नजरंदाज किया जाए। मेरा कहना यह है कि अभी की स्थिति इतनी अजीब है कि उच्चशिक्षा प्राप्त करने वाले लड़कों को जितनी जल्दी शिखर तक पहुंचाए उतना ही अच्छा है। इसके लिए इस प्रदेश में अपने लोगों के लिए एक बोर्डिंग की बेहद आवश्यकता है। ठाणे और कोलाबा जिले के छात्रों को सुविधा हो इसलिए मैंने पनवेल में बोर्डिंग स्थापित करने की योजना बनाई है। इसके लिए आप सभी लोग क्षमतानुसार आर्थिक मदद करेंगे ऐसी उम्मीद है।
दूसरा पेशा जो मैंने आपको सुझाया है वह है खेती। यह धंधा सुझाने का उद्देश्य यह है कि अस्पृश्य वर्ग को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर जीवन बिताने की व्यवस्था करनी चाहिए। यह कहने में हर्ज नहीं कि अस्पृश्य में शामिल महार जाति आज की स्थिति में भिखारियों की जमात है। रोजाना अधिकारपूर्वक घर-घर जाकर डलिया-डलिया भरकर बासी टुकड़े इकट्ठा करके जीवनयापन करना इस जाति की आदत बन गई है। इस कारण गांव में इस जाति का कोई मान-सम्मान नहीं है। इस रिवाज के कारण इस जाति का स्वाभिमान नष्ट हो गया है। कुछ भी कहो, जूतों पर रखो, मगर मुझे टुकड़ा दो। यह इस जाति का स्वभाव बन गया है। इस रिवाज के