94. इस बार हमें बडा समंदर पार कर जाना है - सितंबर 1936 पुणे - Page 551

534 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जरूरत पड़े तो चल कर वहां पहुंचने की काबीलियत उसमें होनी चाहिए। रात-बेरात अपने-अपने तहसील के लोगों के लिए घूमना पड़े तो घूमने की काबिलियत होनी चाहिए। यह काम किसी बूढ़े, संधीवात से ग्रस्त कौंसिलर से कदापि नहीं हो सकता। तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपने पक्ष का उम्मीदवार अपनी पार्टी के अनुशासन में रहने वाला होना चाहिए। पार्टी के नियमों के अनुसार व्यवहार करने की और अपना काम करने की काबिलियत उसमें होनी चाहिए। पार्टी के लिए निःस्वार्थ बुद्धि से काम करने वाला होना चाहिए। स्वार्थी आदमी को मैं ढेले भर का मोल देने के लिए तैयार नहीं हूं।

आपके जिले से जिन्हें चुना गया है, उन राजाराम भोले का उदाहरण लीजिए। उनसे अधिक पढ़ा-लिखा और लायक आदमी पुणे में नहीं है। भाई-भतीजावाद की ओर, जिले के गलत अभिमान की ओर अथवा वतनदारी की ओर ध्यान नहीं देना है। केवल नाम के साथ किसी की काबिलियत या महत्व लगा नहीं रहता है वह उनके द्वारा किए जाने वाले काम से पता चलता है। श्री. भोले अगर निर्विरोध चुन कर आएं, तो हमें कुल तीन जगहें मिलेंगी। उनका अगर विरोध नहीं हुआ तो वे आसानी से जीत सकते हैं। और उन्हें दिए न गए मतों से अपनी पार्टी का दूसरा उम्मीदवार जीत जाएगा। और दूसरे हिस्से में भी अपने पक्ष का उम्मीदवार अपने दूसरे हिस्से के मतों से आम चुनावों में जीत कर आएगा। इस तरह हम अगर अनुशासित ढंग से पेश आएं तो पुणे में ही हम तीन जगहें पा सकते हैं। इसीलिए आप तहसील, गांव, जिले का अभिमान छोड़ कर पार्टी के हित को ध्यान में रखते हुए योग्य उम्मीदवार को ही जिता कर भेजिए। कौंसिल कोई महार की नहीं है जो कि बाप मरा तो वह उसके बेटे को मिलेगी!

फिलहाल मेरी सेहत ठीक नहीं है। रक्तचाप बढ़ने के कारण मैं थोड़ी दूरी तक भी चल नहीं पाता। इसलिए हर जगह जाकर आशंकाओं का समाधान करना अब मेरे लिए संभव नहीं है। मेरी कसौटी पर खरे उतरे उम्मीदवारों के खिलाफ अगर कोई कुछ करना चाहे तो उन्हें वह अच्छी तरह सोच-समझ कर और अपनी जिम्मेदारी समझ कर करना होगा। मैं उनकी कृति में छिपा स्वार्थ खोल कर दिखा दूंगा। दिनोंदिन मेरे ऊपर कई तरह की जिम्मेदारियां आ रही हैं। अपने समाज के हित के कार्य के कारण मेरे कई हितशत्रू पैदा हुए हैं। आज की लड़ाई में अगर मेरे ऊपर कौन से प्राणांतिक प्रसंग पैदा होंगे, मैं खुद नहीं कह सकता। ऐसे कठिन हालात में भी मैं आपके बारे में पूरी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूं। मुझ पर भरोसा हो तो मैंने जिन योग्य उम्मीदवारों को चुना है, उन्हें ही अपने वोट देकर जिताएं और अपने समाज का हित साधें। सभी जगहों पर अगर बूढ़ों को हक हो तो फिर बूढ़ों की ही