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जिस पेड़ की छांव में सुखपूर्वक बसना है, उसकी डालें तोड़ने की
क्रूरता ना करें
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर नवंबर, 1936 में विलायत गए। उससे पहले उन्होंने दिनांक 7 नवंबर 1936 के जनता में घोषित किया था उसके अनुसार रविवार दिनांक 8 नवंबर, 1936 के दिन सुबह 9 बजे दामोदर हॉल, परेल, मुंबई में समता सैनिक दल की एक सार्वजनिक सभा बुलाई थी। इस सभा के अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर थे।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भाषण करने के लिए खडे़ रहे तब तालियों की गड़गड़ाहट हुई। उन्होंने अपने भाषण में कहा,
”कल किसी जरूरी काम के लिए मैं विलायत जा रहा हूं। मेरी गैरहाजिरी में आपको बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभानी है। आप जानते ही हैं कि नए संविधान के अनुसार हमारे अस्पृश्य समाज को विधिमंडल में 15 आरक्षित सीटें मिली हुई हैं। उस विधिमंडल के चुनाव आगामी फरवरी माह में होने हैं। आपको मिली ये पंद्रह सीटें इस इलाके के अलग-अलग जिलों में बंटी हुई हैं। इन जगहों के लिए मैंने अपनी ‘स्वतंत्र मजदूर पार्टी’ की ओर से भिन्न-भिन्न जगहों पर उम्मीदवार खडे़ किए हैं। पहले साफ कर दूं कि यह चुनाव लड़ने के लिए मैंने तथा मेरे सहयोगी मित्रों ने मिल कर स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की है। काँग्रेस जैसी बलाढ्य एवं सुसंगठित संस्था इस देश में होते हुए नई संस्था खोलने की जरूरत क्यों पैदा हुई इसका जवाब बहुत ही सरल है। काँग्रेस का प्रमुख ध्येय है आजादी। मुझे तथा मेरे सहयोगियों को यह उद्देश्य मान्य है। लेकिन वह पाना आसान बात नहीं है। गांधीजी का सत्याग्रह का शस्त्र आजादी पाने के लिए नहीं चलेगा, वह भौंथरा साबित होगा। सविनय अवज्ञा आंदोलन के जरिए भी सरकार से आजादी पाना असंभव बात है, ऐसा सबको लगता है। इसके बावजूद बेकार आजादी पाने की बात करने में क्या धरा है? जब तक सच्ची स्वतंत्रता पाने की हिम्मत हममें नहीं है, तब तक कानूनी राह से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होना ही ठीक होता है ऐसा हमें ईमानदारी से लगता है। उसमें भारत एक राष्ट्र नहीं, इस देश में 4000 विभिन्न जातियां हैं। इन अलग-अलग जातियों के विद्रोह के कारण जातिभेद, प्रांतभेद, टंटे-बखेडे़ और धर्मभेद के गंभीर प्रसंग आदि के कारण एकता रहना असंभव है। हिंदू, मुसलमान और ईसाइयों के मकसद अलग-अलग हैं। मान लीजिए, आज के हालात में अंग्रेज सरकार का छत्र
* ‘जनता’ : 5 दिसम्बर, 1936