96. जिस पेड़ की छांव में सुखपूर्वक बसना है, उसकी डालें तोड़ने की क्रूरता ना करे - नवंबर, 1936 मुंबई - Page 558

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नष्ट हुआ तो जिन्हें एक राष्ट्रीयत्व की कल्पना मंजूर नहीं है, वे जाति और धर्म के अभिमानी लोग आपस में लड़ाई कर राजनीतिक सŸा अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे।

दूसरी बात यह है कि हमारी पार्टी में और कॉंग्रेस पार्टी में कुछ फर्क हैं। काँग्रेस को नए सुधार अधूरे लगते हैं। और इसके लिए विधिमंडल में जाकर इन सुधारों के निषेधार्थ मंडल को तोड़ना उन्हें अच्छा लगता है। लेकिन, ये सुधार अधूरे लगने के बावजूद विधिमंडल में जाकर इन सुधारों के बल पर काम कर अधिकारों के बल पर अधिक हक पाने की निरंतर कोशिश करते रहना हमें पसंद है। विधिमंडल को तोड़ कर बच्चों जैसे खेल करने के दिन अब रहे नहीं। सच्ची आजादी पाने की ताकत हमारे हाथ में नहीं होते हुए भी, हममें उतनी हिम्मत न होते हुए भी, आजादी के हवामहल खडे़ करना आखिर नुकसानदेह साबित हो सकता है। ऐसे में यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि काँग्रेस एक ऐसा जमावड़ा है, जिसमें बेकार, मजदूर, पूंजीपति, साहूकार, किसान, खेतमजदूर, जमींदार, छोटे-बडे़ व्यापारी. मध्यवर्ग आदि परस्पर विरोधी हित संबंधों वाले लोग हैं। संक्षेप में बताना हो तो यह कद्दू और छुरे दोनों का साथ जिसमें हो, ऐसी पार्टी है। खून चूसने वाले और जिनका खून चूसा जा रहा हो, उनकी आपस में दोस्ती कैसे संभव है? आज कॉँग्रेस अमीरों के चंगुल में है। गरीब, मजदूर और खेतीहर वर्ग का वह क्या हित करेगी? काँग्रेस खेतीहर, मजदूर लोगों की संस्था नहीं है। वह पूंजीपतियों का साथ देने वाली संस्था है। उसके हाथों श्रमजीवि बहुजन समाज की हितसाधना बड़ा कठिन है। हमारी स्वतंत्र मजदूर पार्टी इससे अलग है, इसके ठीक विपरीत है। वह समता के सिद्धांत की बुनियाद पर खड़ा है। इसमें वर्गभेद का कोई स्थान नहीं है। श्रमजीवि, खेतीहर वर्ग की हितरक्षा हम जितने अपनेपन से कर सकते हैं, उतना करना कांग्रेस के लिए असंभव है। पददलित, गरीब आदि श्रमजीवि वर्ग के हितों की रक्षा और संवर्द्धन करना, यही हमारे पक्ष का प्रमुख कार्य है। सिद्धांतों के साथ समझौता किए बगैर विधिमंडल के किसी भी पक्ष के साथ हम सहयोग करेंगे। इसी तरह मैंने अस्पृश्य समाज को छोड़ कर अन्य जाति के लोगों के साथ सहयोग क्यों किया, इस तरह का सवाल मुझसे पूछा जाता है उसके बारे में बता दूं, कि नए संविधान के अनुसार जिसकी स्थापना की जा रही है उस लेजिस्लेटिव एसेंब्ली में कुल 175 सदस्य चुन कर जाने वाले हैं। इन कुल 175 सदस्यों में हमारे अस्पृश्य समाज के 15 सदस्य होंगे। इन पंद्रह लोगों की मदद से कोई कुछ नहीं कर सकता। इसलिए अपनी मदद के लिए अधिक लोगों की जरूरत है। और जिन लोगों से मदद लेनी हो उनकी सोच हमारी सोच से मिलनी चाहिए, वे हमारे मित्र हों, यह भी जरूरी है। इसलिए, जिन-जिन स्पृश्य लोगों ने आज तक अपनेपन से हमारी मदद की जिन्होंने अपने समाज कार्य के लिए