96. जिस पेड़ की छांव में सुखपूर्वक बसना है, उसकी डालें तोड़ने की क्रूरता ना करे - नवंबर, 1936 मुंबई - Page 559

542 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्वार्थ का त्याग किया, ऐसे लोगों को चुनाव में जिता कर उन्हें अपने पक्ष में शामिल कर लेना जरूरी है। इसलिए अब बिना वजह तर्क-कुतर्क के चक्कर में पड़ कर समय ना गंवाएं। हमारे पक्ष की तरफ से जिन कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, उसे पार लगाने के लिए आपस के झगडे़-टंटे, मारपीट आदि अनिष्ट बातों को फिलहाल परे कर दीजिए। अनुशासन और सिद्धांत के साथ अगर आप चलेंगे तो आज मेरे हाथों अपने समाज के लिए जो भी थोड़ा बहुत मैं कर पाया हूं, वह बडे़ पैमाने पर करने की प्रबल शक्ति मुझे प्राप्त होगी। अपने सिद्धांतों और अनुशासन के लिए लड़ते-लड़ते मैं विधिमंडल के चुनावों में अगर हार भी गया, तब भी कोई बात नहीं। लेकिन मुंबई जी वार्ड तथा उपनगर विभाग की ओर से खड़े हो रहे अपने उम्मीदवार मि. कालोखे को आप चुनकर लाएं। उसी में आपका कल्याण है। उसी में आपकी इज्जत है। इस वक्त महार-मांग के जातिभेद को भूल जाइए। अब के बाद हम सब एक हैं, यही उज्ज्वल भावना मन में निरंतर जागृत रखें।

अब मैं एक और महत्वपूर्ण बात की ओर आपका ध्यान दिलाता हूं। वह मुद्दा है - मैंने महार जाति के ही सभी उम्मीदवारों को क्यों चुना? और, अन्य समाज के लोगों को क्यों उम्मीदवारी नहीं दी? सच पूछो तो इस मामले में हम ज्यादा गहराई में न जाएं, यही बेहतर है। इसके बावजूद आज जिन्होंने राष्ट्रीय हरिजन पक्ष की स्थापना कर इस आरोप को उजागर किया है उनका जवाब देना जरूरी है। राष्ट्रीय हरिजन पक्ष के लोगों को मैं एक ही नाम से पुकारना चाहता हूं - ये ‘ले भागो’ नीयत के लोग हैं। मैंने इसलिए उन्हें अपने पक्ष से नहीं निकाला कि वे चमार हैं। भले वे चाहे कुछ कहते फिरें मुझे उसकी परवाह नहीं। उन्हें न चुनने की वजह उनका ‘ले भागो’ पना ही है। जहां भी कुछ हासिल हो वहां पहुंच जाओ! सिद्धांतों का, अनुशासन का कभी उन्हें अहसास नहीं था। जो मिले बटोर कर अपनी झोली में डाल लो, यही उनका धर्म है! हमने महाड सत्याग्रह किया, आत्मनिर्भरता के कई आंदोलन चलाए, नासिक सत्याग्रह किया, चाहे आप बाकी सब छोड़ कर पुणे करार का ही उदाहरण लें। सिद्धांतों के लिए जान पर बन आने तक हम काँग्रेस और उसके पंचप्राण बन चुके गांधी के साथ भिड़ गए। उस समय ये राष्ट्रीय हरिजन पार्टी के लोग हमारे दुश्मन के खेमे में बैठे हुए थे! जब कुछ पाने की बारी आए तो ऐसे ‘ले भागो’ लोगों को हम तो क्यों याद रखें?! चमगादड़ के रूप में जो अपना जीवन जीना चाहते हैं उनके आरोपों की और उनकी हल्ला मचाने की आदत की परवाह मैं नहीं करता। इतना ही नहीं, पुणे करार से पहले जब गांधीं ने अपने प्राण दांव पर लगा दिए, तब ये लोग गांधी की जान बचाने के पीछे विधिमंडल की अपनी सीटें तक छोड़ने के लिए तैयार बैठे थे! तो अब मेरी कोशिशों से जो ये जगहें मिली हैं, वे क्यों मांग रहे हैं? इस राष्ट्रीय हरिजन पार्टी के प्रमुख नेता कहलाने वाले श्री. नारायणराव काजरोलकर अगर वैसा ही समय आए तो डॉ. सावरकर की