7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 58

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आप जागृति की ज्योति को, चिंगारी को बुझने न दें। इस जागृति के काम के लिए आपको कुछ स्थानीय नेताओं की जरूरत है। मार्गदर्शके के बिना चलना असंभव लगता है। हम में से जो पेंशनर लोग हैं उनका कर्तव्य है कि इस तरफ ध्यान दें। मैं इस उम्मीद के साथ अपने भाषण को विराम देता हूं कि वे स्वजनों के उद्धार के इस महत्त्वपूर्ण काम के लिए आगे आएंगे।“ ख्1, दूसरे दिन 20 मार्च, 1927 को सुबह नौ बजे से परिषद का कामकाज शुरू हुआ

और निम्न प्रस्ताव पारित हुए।

पहला समूह

पहला प्रस्ताव- यदि ऊंची जीतियों के लोग चाहते हैं कि बहिष्कृत वर्ग द्वारा अपने कल्याण के लिए शुरू किए आंदोलन से ऊंची जातियों और बहिष्कृत वर्ग में आपसी वैमनस्य पैदा न हो, तो यह परिषद उनसे निम्न अनुरोध करती है-

(अ) जब बहिष्कृत वर्ग के लोग सार्वजनिक स्थानों और तालाबों का उपयोग

कर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, तो ऊंची जातियों के लोग

उनके साथ सभी तरह के व्यवहार बंद करके उनके खिलाफ हड़ताल की

घोषित करते हैं। ऐसा न करते हुए ऊंची जाति के लोगों को उन्हें सक्रिय

मदद करनी चाहिए।

(ब) ऊंची जाति के लोगों को बहिष्कृतों को घरेलू नोकर को तौर पर काम

पर रखना चाहिए।

(क) जातिभेद को खत्म करने के लिए मिश्र विवाह पद्धति का रिवाज शुरू

करना चाहिए।

(़ड) बहिष्कृत वर्ग के छात्रों को घर पर दिन तय करके भोजन को बुलाया या

भोजन की व्यवस्था कर उनकी मदद करें।

(इ) मरे हुए जानवरों को खींचकर ले जाने के लिए बहिष्कृत वर्ग के लोगों

पर निर्भर न रह कर अपनी व्यवस्था खुद कर लें।

समूह - दो

प्रस्ताव एक - पिछले विधान मंडल में श्री सी.के. बोले ने सार्वजनिक कुंओं और तालाबों के बारे में प्रस्ताव पेश किया है। सरकार उस पर अमल करके उन स्थानों पर सूचनापट्ट लगाए और जरूरी हुआ तो क्रि.प्रो. कोड सेक्शन 144 पर अमल करके स्थानीय नेताओं की जमानत से अस्पृश्यों को अपने अधिकारों का उपभोग करने में मदद करें।

  1. ”बहिष्कृत भारत“ः 3 अप्रैल, 1927