7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 61

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चौथा समूह

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पहला प्रस्ताव

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सभा स्वामी श्रद्धानंद की अमानवीय हत्या पर पर दुःख प्रगट करती है। हिन्दू समाज को उनके विचारों के अनुरूप अस्पृश्यता उन्मूलन करना चाहिए।

अध्यक्ष द्वारा समारोप करने के बाद श्री. शिवराम गोपाल जाधव ने लोगों और अध्यक्ष के प्रति आभार व्यक्त किए। उसका अनुमोदन करने के लिए श्री अनन्त विनायक चित्रे खड़े हुए। उन्होंने आभार के प्रस्ताव को अनुमोदन करने के बाद सुझाया कि मुझे लगता है कि आज जो इतना बड़ा सम्मेलन हुआ है उसे कोई महत्व का कार्य किए बगैर समाप्त नहीं होना चाहिए। इस महाड शहर में अस्पृश्य लोगों के लिए पीने के पानी की भारी तंगी है। यह कमी दूर हो इसलिए यहां की नगरपालिका ने यहां के तालाब सभी जाति के लोगों के लिए खोल दिए हैं लेकिन इस तालाब से पानी भरने की परंपरा अभी भी अस्पृश्य लोगों ने शुरू नहीं की है। यदि इस सम्मेलन ने यह शुरूआत की तो कहा जा सकता है कि इस सम्मेलन ने एक महत्वपूर्ण काम किया। इसलिए हम सब अध्यक्ष के साथ महाड के चवदार तालाब प्रवेश कर पानी भरें। इसके बाद इस सम्मेलन के सभी लोग अध्यक्ष के पीछे-पीछे सम्मेलन स्थल से बाहर निकलें और सबकी एक विशाल पैदल यात्रा निकाली गई। यह कतार महाड़ शहर के बाजारों से शांतिपूर्वक गुजरते हुए तालाब पर पहुंची।“ ख्1,

अम्बेडकर अब चवदार तालाब के किनारे खड़े थे। दुनिया के विद्वानों में से एक महाविद्वान, उदाŸा उद्देश्य से प्रेरित एक महान हिन्दू नेता, दलितों के स्वातंत्र्यसूर्य डॉ. अम्बेडकर कर्मक्षेत्र में उतरे। स्वतंत्रता के अधिकार भीख मांगने से नहीं मिलते। उन्हें अपनी ताकत के बल पर हासिल करना पड़ता है। वे दान में नहीं मिलते। डॉ. अम्बेडकर इस महाअनुभव का पाठ दलितों को पढ़ा रहे थे। आत्मोद्धार दूसरे की कृपा से नहीं होता वह स्वयं करना पड़ता है। डॉ. आबेडकर कर्मवीर बनकर अपने अनुयायियों को शुरूआती मार्गदर्शन दे रहे थे। उन्हें सुसंगठित और प्रतिरोध के लिए सक्षम बना रहे थे। कृतिशूरता इतिहास रचने वाले महान पुरुषों का स्वभाव होता है।

उद्देश्य के प्रति अडिग श्रद्धा रखकर डॉ. अम्बेडकर दलितों में निष्ठा निर्माण कर रहे थे। वे जिस ध्येय का उद्घोष कर रहे थे वह अब संघर्ष की अग्निपरीक्षा से गुजर रहा था। अब अम्बेडकर तालाब के किनारे खड़े थे। जिस तालाब का पानी पीकर पशु-पक्षी अपनी प्यास बुझाते थे, उसका पानी पीने के लिए उन पर अपनी ही मातृभमि और पुण्यभूमि में पाबंदी लगी हुई थी। जिसके लिए सार्वजनिक स्थलों और मंदिरों के दरवाजे बंद थे ऐसा वह महापुरुष हिन्दूधर्म के ठेकेदारों और हिन्दूधर्म

  1. बहिष्कृत भारत - 3 अप्रैल, 1927