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के पाखंड को भारत के सामने उजागर कर रहा था। सभी में ईश्वर है का उद्घोष
करने वाले और कुŸो-बिल्लियों तक को प्यार और दुलार देने वाले, स्वधर्मियों को
पशुओं से भी नीच मानने वाले इन पापियों के अघोर पाप को यह क्रांतिपुरुष सारी
दुनिया के सामने बेनकाब कर रहा था।
अम्बेडकर चवदार तालाब की सीढि़यां उतरकर नीचे गए। वे नीचे झुके और
तालाब से एक अंजुलिभर पानी पीया। उस विशाल जनसमुदाय ने अपने नेता का
अनुकरण किया। उन्होंने अपने नागरिक और मानवीय अधिकारों का प्रयोग किया।
तुरंत सम्मेलन स्थल पर मोर्चा शांतिपूर्वक लौटा और विसर्जित हो गया। नेताओं को
सही समय पर कृति के लिए कदम उठाने चाहिए। जो काम सैंकड़ों प्रस्तावों से नहीं
होता वह एक कृति से हो जाता है। कार्लाइल ने भी कहा है कि कृति ही मानव
का वास्तविक उद्देश्य है।
इस तरह महान कार्य कर सम्मेलन समाप्त हुआ। हर कोई घर लौटने की
तैयारी में लग गया। भारत के तीन हजार वर्षों के इतिहास का परममंगल दिन, और
मानवता और समता का संदेश देने वाला यह सुनहरा दिन था, 20 मार्च, 1927। वह
डॉ. अम्बेडकर के जीवन का परम युग प्रवर्तक दिन था। उस दिन डॉ. अम्बेडकर
की कीर्ति की लहरें देशभर में फैलने लगीं। ख्2,
महाड के ऊंचीजातियों के लोगों का अत्याचार
सम्मेलन खत्म होने के बाद अध्यक्ष और मुंबई से आए हुए मेहमान सरकारी बंगले
पर गए जहां वे ठहरे थे। और बाकी लोग अपने-अपने गांव जाने से पहले भोजनगृह
की ओर गए। लगभग दो बजे के आसपास वीरेश्वर मंदिर का गुरव (पुजारी) गांवभर
में झूठी मुनादी करता रहा कि अस्पृश्य लोग वीरेश्वर के मंदिर में प्रवेश करने वाले है,
इसलिए दौड़कर मंदिर की रक्षा करनी चाहिए। अस्पृश्यों द्वारा तालाब को दूषित करने
का बदला लेने के लिए तैयार बैठे ऊंची जाति के लोगों को यह बहाना मिल गया।
मुनादी सुनने के बाद चार-पांच सौ लोग लाठियां लेकर वीरेश्वर के मंदिर में जमा हो
गए और शोर मचाने लगे कि अस्पृश्य लोग मंदिर में घुसने वाले हैं। यह देखकर शहर
का पुलिस अफसर डाकबंगले पर आकर डॉ. आबेडकर से पूछने लगा - आपके लोग
मंदिर में घुसने वाले हैं इसलिए शहर के लोग मंदिर के पास जमा हो गए हैं तो मैं
उन्हें क्या बताऊं। डॉ. अम्बेडकर ने उनसे कहा कि - हमारी मंदिर में घुसने की इच्छा
नहीं है और जरूरत भी नहीं है, इसलिए आप लोगों को आश्वासन देकर शांत कीजिए।
पुलिस अफसर के जाने के बाद अपने लोगों को निर्देश देने के लिए उन्होंने कुछ लोगों
- बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः लेखक - धनंजय कीर, पृष्ठ 75-76