46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को भोजनालय में भेजा। उसके अनुसार अस्पृश्य लोग भोजन करके अपने-अपने गांव जाने के लिए तैयार हो गए। काफी अस्पृश्यों के अपने-अपने गांव चले जाने के बाद मंदिर में जमा गांव के गुंडों ने बाजार से होकर अपने-अपने घरों को जा रहे अस्पृश्यों पर हमला किया और कई लोग घायल हुए। इतना हो जाने के बावजूद महाड़ के मामलेदार ने भीड़ को कम करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। आखिर में सवा चार बजे मामलेदार और पुलिस सब-इंस्पैक्टर टाक बंगले पर आए और डॉ. अम्बेडकर से कहने लगे कि आप शांति कायम रखने के लिए हमारे साथ चलिए। अपने लोगों को आप समझाइए और हमारे लोगों को हम समझाएंगे। असल में अस्पृश्य लोगों को समझाने का कोई कारण ही नहीं था क्योंकि अस्पृश्य लोगों को विशाल जनसमुदाय ने शांति कभी भंग ही नहीं की थी। इसके अलावा बहुत से अस्पृश्य शहर से बाहर चले गए थे। फिर भी मामलेदार के कहने पर डॉ. अम्बेडकर और उनके साथ बंगले पर ठहरे अन्य लोग शहर की तरफ जाने को निकले। रास्ते में मंदिर के पास जमा ऊंची जाति के लगों ने उन्हें रोका और उनकी तरफ से डिंगणकर और तुलजाराम सेठ का भाई चुनीलाल कहने लगे के मंदिर के बारे में स्पष्टीकरण दो। इस पर डॉ. अम्बेडकर ने वही जवाब दिया जो उन्होंने पुलिस अफसर को दिया था। लेकिन लोग शांत हों ऐसा वर्ताब करने के बजाय वे ऐसी बातें करने लगे जिनसे लोग क्षुब्ध हो सकते थे। म्युनिसिपालिटी का प्रस्ताव कोई लोगों का प्रस्ताव नहीं है। आप जब तालाब पर गए तो हमें सूचना देकर नहीं गए आदि सवालों की झड़ी लगा दी। इन लोगों से वाद-विवाद करने का कोई मतलब नहीं यह जानकर डॉ. अम्बेडकर और उनके साथ के लोग आगे बढ़ने लगे। रास्ते में कुछ लोग मंदिर में घुस गए रे‘’ का शोर मचाते हुए भागदौड करने लगे। मजिस्ट्रेट ने यह सब देखा मगर उन्हें गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं की और बात को हंसकर उड़ा दिया। आखिर में जिन अस्पृश्य लोगों को समझाने के लिए डॉ. अम्बेडकर को ले जाया गया था उनमें से कोई भी अस्पृश्य वहां नहीं था यह देखने के बाद डॉ. अम्बेडकर और उनके साथ के लोग बंगले पर वापस लौट आए। वहां 100 के लगभग अस्पृश्य लोग आकर बैठे थे। उनमें से कुछ घायल थे। यह दृश्य दिखने तक किसी को कल्पना भी नहीं थी कि दंगे की परिणिती खूनखराबे में हुई। दंगा पीडि़तों के हालात समझने के बाद अस्पृश्यों के नेताओं को इस बात का आश्चर्य हुआ कि दंगे के दिन मजिस्ट्रेट शहर में था किंतु दंगे पर काबू पाने का प्रयास नहीं किया जा सका। लेकिन वह विचार करने का समय नहीं था। सारी बातों को दरकिनार करके घायलों को अस्पताल में ले जाने की व्यवस्था की गई। वहां से उन्हें पुलिस चौकी ले जाकर उनकी फरियादें (रपट) लिखाई गईं। सबूत इकट्ठा करने का काम बहुत मुश्किल था। ऊंची जातियों के लोग एक साजिश की तरह काम कर रहे थे, इसलिए कोई सच बोलने को तैयार नहीं था। अस्पृश्य लोग डरे होने के कारण नाम बताने के लिए आगे नहीं आ रहे थे। ऐसी स्थिति में