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मुंबई से आए नेताओं ने दो दिन रुककर जितना संभव था, उतने सबूत जुटाने की कोशिश की। स्थानीय पुलिस आरोपियों को सजा दिलाने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं थी। यह देखने के बाद गवर्नर और कलेक्टर को (Telegram) तार भेजकर हकीकत की जानकारी दी गई और अनुरोध किया गया कि पुलिस को इस मामले में उचित निर्देश दिए जाएं। यह देखा गया कि इस मारपीट की आग महाड़ शहर के बाहर भी फैली है। शहर के अंदर मारपीट खत्म होने के बाद ऊंची जातियों के कुछ दुष्ट लोगों ने आसपास के कुछ गांवों के मराठों को यह संदेश भेजा कि जब महार लोग लौटते समय तुम्हारे गांव से गुजरेंगे तो उनकी पिटाई करो। इसी तरह इन दुष्ट लोगों ने दूर-दूर के गांवों तक यह चेतावनी देने वाली सूचनाएं भेजी कि महाड़ के तालाब को अस्पृश्यों ने दूषित कर दिया है, आप अपने कुएं संभालिए। इसका नतीजा यह हुआ कि आग सभी तरफ फैल गई और हर गांव में अन्य लोगों की तुलना में अस्पृश्य लोग अल्पसंख्यक होने के कारण सभी जगह उन्हें मार खानी पड़ी।
कुछ जगह पर उन्हें गंभीर चोटें आईं। लोगों को बचाने के लिए जिन-जिन गांवों में ऐसे अत्याचार हुए और जिन लोगों ने अत्याचार किए उनकी सूची बनाकर कोलाबा जिले के सुपरिटेंडेंट को भेजी गई। इतनी कार्यावधि करने के बाद मुबई के लोग छुट्टी ने होने के कारण मंगलवार की सुबह मुंबई वापस लौट आए। डॉ. अम्बेडकर और चित्रे वहीं रुके रहे। उन्होंने जिला सुपरिटेंडेंट से फिर मुलाकात करके सारी जानकारी दी और पुलिस को समझाया कि उसे अस्पृश्यों को बचाने के लिए क्या करना चाहिए। मंगलवार की शाम को शहर के गैर-ब्राह्मण नेताओं की बैठक बुलाई गई यह बैठक इसलिए बुलाई गई थी क्योंकि महाड के दंगों में गैर-ब्राह्मण आगे थे। इसलिए उनके नेताओं जरिए उन पर काबू पाया जाए इस मकसद से यह बैठक बुलाई गई थी। लेकिन दुःख की बात यह थी कि एक दो लोगों को छोड़कर बाकी सभी ने ऐसे व्यवहार पर काबू पाने के काम से पल्ला झाड़ लिया। इतनी कोशिशें करने के बाद डॉ. अम्बेडकर और चित्रे बुधवार को मुबई लौटे। इसमें कोई शक नहीं कि यह सम्मेलन हर दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। उसके नतीजे सही थे या गलत, यह कुछ समय बाद ही तय होगा। लेकिन यह कहने में हर्ज नहीं है कि उसके नतीजे प्रभावी रहे।
सम्मेलन को सफल बनाने में और मारपीट का शिकार बने लोगों की मदद करने में महाड के चंद्रसेनीय कायस्थ जाति की युवा पीढ़ी ने जो मदद की उसके लिए कोलाबा जिले का अस्पृश्य वर्ग उनका हमेशा ऋणी रहेगा।