8. राज्य का अभिमान न हो तो राज्य टिकता नहीं - मई 1927 बदलापुर (ठाणे ) - Page 65

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राज्य का अभिमान न हो तो राज्य टिकता नहीं

तीन मई, 1927 को ठाणे जिले के बदलापुर में शाम छह बजे डा़. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में त्रिशत सांवत्सरिक शिवाजी उत्सव सफलतापूर्वक मनाया गया।

इस उत्सव का अध्यक्ष किसे बनाया जाए इसे लेकर उत्सव की व्यवस्थापन कमेटी में काफी चर्चा हुई थी। आखिरकार सभी गांव वालों की राय से तय हुआ कि मुंबई के बहिष्कृत वर्ग के नेता डॉ. अम्बेडकर को ही बुलाया जाए। इस प्रस्ताव के अनुसार कमेटी के मुख्य व्यवस्थापक पालये शास्त्री ने मुंबई जाकर ‘ब्राह्मण- ब्राह्मणेत्तर’ अखबार के संपादक रा. नाईक के जरिए डॉ. अम्बेडकर से भेंट की और उनसे शिवाजी उत्सव का अध्यक्ष पद स्वीकारने का अनुरोध किया। पालये शास्त्री जैसे पौरोहित्य करने वाले ब्राह्मण द्वारा अनुरोध किए जाने पर डॉ. अम्बेडकर ने उनके अनुरोध को खुशी-खुशी स्वीकार किया और वे उत्सव के दिन चार बजे मुंबई से रा. नाईक, रा. सीताराम नामदेव शिवतरकर, रा. गणपत महादू जाधव आदि लोगों के साथ बदलापुर पहुंचे। वे पालये शास्त्री के घर ठहरे। चायपान के बाद डॉ. अम्बेडकर ठीक छह बजे उत्सव स्थल पर पहुंचे।

उत्सव की शुरूआत में ईश वंदना हुई। उसके बाद पालये शास्त्री का प्रास्ताविक भाषण हुआ। इसके बाद नानासाहेब चाफेकर ने गांव वालों की तरफ से अनुरोध किया कि डॉ. अम्बेडकर उत्सव की अध्यक्षता स्वीकार करें। मेसर्स काले, सुले, पाटील और मोकाशी द्वारा अनुमोदन किए जाने के बाद डॉ. अम्बेडकर अध्यक्ष के रुप में विराजमान हुए। उन्होंने अपने भाषण में एक घंटे शिवाजी के विभिन्न गुणों पर बहुत प्रभावी ढंग से प्रकाश डाला। और आखिर में कहा कि जिस शिवाजी ने अपने असाधारण गुणों के द्वारा राज्य स्थापित किया वह राज्य चिरस्थायी क्यों नहीं हो पाया? इसका कारण यह था कि इस राज्य पर सभी को बराबर का अभिमान नहीं था। एक राजा के जाने और दूसरे के आने पर लोगों के रोजमर्रा के जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता था। नेपोलियन द्वारा ब्रिटेन पर हमले के समय ब्रिटेन के अपने देश के लोगों को जो जवाब दिया था वह जवाब यहां भी लागू होता है। यह भाषण होने के बाद रा. नाईक का भी विचारोŸोजक भाषण हुआ। बाद में रा.भा.रा ओक ने हास्यपूर्ण शैली में लोगों का आभार प्रदर्शन किया। इसके साथ उत्सव का पहला भाग समाप्त हुआ। बाद में वे पालये शास्त्री के घर भोजन के लिए गए। उन्होंने भी किसी भेदभाव के बगैर अपने घर में डॉ. अम्बेडकर और उनके साथ आए अस्पृश्य साथियों के साथ भोजन किया।