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मुंबई के चीराबाजार में 4 जून, 1927 को रात साढ़े आठ बजे बहिष्कृत वर्ग की
सार्वजनिक सभा बहिष्कृत भारत के संपादक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर बार-एट-लॉ
की अध्यक्षता में संपन्न हुई। बहिष्कृत हितकारिणी सभा के जनरल सेक्रेटी श्री एस.
एन. शिवतरकर ने महाड़ सम्मेलन के बाद स्पृश्यों द्वारा की जा रही गुंडागर्दी की
विस्तृत जानकारी दी। यह सुनकर लोगों के मनों पर दुखद परिणाम हुआ। बाद
में श्री गंगावणे तांबे, गिमोनकर, वीरकर, भेसनकर, भातकुडे के स्फूर्तिदायक भाषण
हुए। आखिर में अध्यक्ष ने विचारपूर्ण भाषण किया। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में
लोगों को समझाया कि अभी अस्पृश्य वर्ग की स्थिति कितनी दयनीय है। अपना
उद्धार करने के लिए हमें खुद की कमर कसनी होगी। यह काम एक - दो लोगों
का नहीं है। इसमें अनेक लोगों ने अपनी छाती तानकर अपनी मनुष्यता स्पृश्यों के
सामने साबित करनी चाहिए। इस काम में अनेकों की बलि चढ़ेगी। हमारे पुरखों
ने रणक्षेत्र में शमशीरों के वारों के जरिए अपनी कलाई बाजुओं के बल को साबित
किया है। अब हमें अपने बुद्धिबल के द्वारा आज के सामाजिक युद्ध में अपना श्रेष्ठ
स्थान हासिल करना चाहिए। ये उद्गार सुनने के बाद दो-तीन युवा उठे और
अपनी अस्तीने चढ़ाकर बोले-बाबासाहेब, हम आपके झंडे तले लड़ने को तैयार हैं।
‘महाड़-अत्याचार निवारक फंड’ के लिए स्थानीय लोगों ने 20 रुपये और भातकुडे
और वीरकर ने अपनी स्कालरशिप से पांच-पांच रुपये अध्यक्ष को अर्पित किए।
इसके अलावा भी कुछ फुटकर रकमें मिलीं। इसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के
बीच अध्यक्ष को फूलमाला पहनाई गई। बाबासाहेब अम्बेडकर की जय के नारों के
बीच सभा विसर्जित हुई।
‘‘बहिष्कृत भारत’’ 1 जुलाई, 1927