11. महार जाति पर स्वार्थी होने का आरोप निराधार - जुलाई 1927 मांगवाड़ा (पूना) - Page 71

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और जलगांव में छात्रावास बनाकर हम महारों और गैर-महारों के लिए सतत् संघर्ष करते रहे हैं। हमें समझ में नहीं आ रहा कि ऐसे में महार जाति के खिलाफ शोर मचाने से क्या हासिल होगा।

आलोचकों का कहना है कि सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाएं सब में समान रूप से अस्पृश्य जातियों में वितरित न करके महार जाति स्वार्थी बनकर सारी सुविधाएं हथिया लेती है। मुंबई में निकालजे नामक महार जाति के व्यक्ति को मुंबई कार्पोरेशन में मनोनित किया गया। लेकिन उनके द्वारा आखिल अस्पृश्य वर्ग की जैसी उन्नति होनी चाहिए थी, वैसी नहीं हो पाई। यह बात मेरे ध्यान में आने पर मैंने ही वह पद चमार जाति के सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी मि. बालू को दिलवाया। सातारा में महार जाति के लोगों की अच्छी-खासी तादाद होने के बावजूद वहां की म्युनिसिपालटी में सरकार नियुक्त सदस्य चमार जाति का है। इन सब बातों पर गौर करने पर यह स्पष्ट है कि महार जाति पर स्वार्थीपन का आरोप कितना निराधार है।

कुछ अज्ञानी महार लोग व्यापक दृष्टि वाले नहीं होंगे। लेकिन केवल इस कारण सारी महार जाति पर आरोप लगाना ठीक नहीं। मेरा अन्य जातियों के लोगों से अनुरोध है कि पहले यह देखिए कि महार जाति के नेता क्या कर रहे हैं फिर आरोप लगाने के लिए आगे आइए। मैं स्वयं मांग जाति के साथ रोटी-बेटी का व्यवहार करने के लिए तैयार हूं। ऐसे में महार और मांगों के बीच में दरार क्यों हो यह मेरी समझ में नहीं आता। मैंने अपने घर पर एक मांग के बच्चे को अपने बेटे की तरह पाला था। अब भी कोई मुझे मांग लड़का लाकर देगा तो मैं उसका पालन-पोषण करूंगा। मैं केवल बड़ी-बड़ी बाते करने वाला नेता नहीं हूं जो कहता हूं वह करता भी हूं। कांग्रेस के अधिवेशन में भोजन के समय जाति के अनुसार अलग-अलग जगह होती है। लेकिन मेरे नेत़ृत्व में हुई बहिष्कृत परिषद में सभी जातियों का भोजन एक स्थान पर होता है। इससे स्पष्ट है कि विभिन्न जातियों में एकता निर्माण करने के लिए कितना प्रयत्नशील है।

इसके बावजूद यदि गैर-महार जातियां महारों से अलग रहना चाहती हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं।वे यदि अलग रहकर अस्पृश्योद्धार का काम करते हैं तो हमें कोई एतराज नहीं हैं। मेरा उनसे अनुरोध है कि वे खास लोगों के नेतृत्व में न रहें। कुछ ब्राह्मण अस्पृश्योद्धार के लिए संघर्ष करते हैं। यह बात सही होने के बावजूद मुझे ऐसा लगता है कि वे अपनी पार्टी को मजबूत बनाने के लिए ही अस्पृश्यों को साथ लेते हैं। हमें ऐसे ब्राह्मण और मराठा चाहिए हमारे उद्धार (आजादी) के लिए निस्वार्थ भाव से काम करें। हमारी दूसरों के हाथों का हथियार (मशाल) बनने की इच्छा नहीं है।

स्वार्थ से प्रेरित लोगों के द्वारा अस्पृश्यता निवारण का काम हो, तो भी मैं चिंतित