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नहीं होऊंगा। क्योंकि मुझे लगता है कि अस्पृश्य होने के कारण मिलने वाली सुविधाओं के जरिए हमें अपनी उन्नति कर लेना आसान होगा। मुझे लगता है कि रा. माटे का असली उद्देश्य अस्पृश्यता निवारण नहीं है। वे अस्पृश्यों को साथ लेकर गैर-ब्राह्मणों को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसी मेरी राय है। यदि श्री म. माटे सप्रमाण यह साबित कर दें कि मेरी राय गलत है तो मैं उनसे जरूर सहयोग करूंगा।
मुझे ऐसा लगता है कि मुस्लमानों से सुरक्षा हो सके इसके लिए हिन्दूसभा अस्पृश्यता निवारण का खेल-खेल रही है। ऐसी स्थति में मेरी गैर-महार भाइयों से अनुरोध है कि वे किसी के पिछलग्गू नहीं बनें। मि. सकट ”दे दान छूटे ग्रहण“, ऐसा चिल्ला-चिल्ला कर भीख मांगे तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा। लेकिन वे यदि माटे के चक्कर में पड़ गए तो मुझे दुःख होगा। मेरा इतना ही कहना है कि चाहे तो बेषक अलग रहो मगर किसी के बगलबच्चे मत बनो।
हम पर आरोप है कि महार जाति के लोग ही काउंसिल के स्थन हथिया लेते हैं। क्या अस्पृश्यों के हितों की रक्षा के लिए काउंसिल में योग्य व्यक्ति का जाना उपयुक्त नहीं है? गैर-महारों में मेरे जैसा व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, यह उनका दुर्भाग्य है। लेकिन मुझे काउंसिल की सीट की अभिलाषा नहीं है। यदि गैर-महारों में कोई ज्यादा योग्य हो तो वह मेरा स्थान ले। अभी यहां से ही इस्तीफा भेजने को तैयार हूं। जब भी आपको शक हो कि मैं काउंसिल में केवल महार जाति के हितों के लिए ही लड़ रहा हूं तो आप मुझे पत्र के द्वारा अपनी शंकाएं अवश्य बताएं मैं सभी की शंकाओं का तत्काल निवारण करूंगा।
स्पृश्य समाज के लोग हमसे कहते हैं कि सुशिक्षित बनो तो अस्पृश्यता अपने आप
खत्म हो जाएगी। लेकिन यह मानना पूरी तरह से गलत होगा कि शिक्षित होने भर से अस्पृश्ता का निवारण हो जाएगा। मैं एक उदाहरण देता हूं, जिससे बात आपके समझ में आ जाएगी। जब तक मेरे चेंबर के पास वाले भोजनालय वाले ब्राह्मण को यह पता नहीं था कि मैं अस्पृश्य हूं तब तक वह अपने कप और प्लेट में मुझे चाय और पकौडी़ देता था। लेकिन परसों एक गुजराती अखबार में छपे फोटो से उसे पता चला कि मैं अस्पृश्य हूं, तब से वह कांच के गिलास में चाय देने लगा। उसे ऐसा करने की भड़काऊ सलाह एक स्पृश्य वर्ग के क्लर्क ने दी थी। जहां ऐसी स्थिति है वहां यह सोचना गलत होगा कि केवल शिक्षित होने भर से अस्पृश्यता
खत्म हो जाएगी।
अगर हमने आक्रामक रुख नहीं अपनाया तो हमारा टिके रह पाना मुश्किल है। हमारा दमन-शोषण हो रहा है तो इसकी वजह यह है कि हमें गुस्सा नहीं आता। हमारे पूर्वजों ने अन्याय का प्रतिकार नहीं किया। यह उनकी बहुत बड़ी गलती थी।