13. बहिष्कृत छात्रों के कर्तव्य निभाने पर ही बहिष्कृत समाज का भवितव्य निर्भर करता है- अक्तूबर 1927 पुणे - Page 75

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बहिष्कृत छात्रों के कर्तव्य निभाने पर ही बहिष्कृत समाज का भवितव्य

निर्भर करता है

बहिष्कृत वर्ग के सुप्रसिद्ध नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर बार-एट-लॉ की अध्यक्षता में रविवार, दिनांक 2 अक्तूबर, 1927 को पुणे में बहिष्कृत छात्रों का चौथा वार्षिक सामाजिक सम्मेलन संपन्न हुआ। कार्यक्रम के लिए डीसी मिशन के अहिल्याश्रम हॉल को सजाया गया था। सम्मेलन का कार्यक्रम शनिवार और रविवार इन दो दिनों का था। शनिवार को छात्रों के भाषण और खेलों की प्रतियोगिताएं हुईं। यह बताने में खुशी होती है कि इन कार्यक्रमों में महार, चमार और मांग जाति के छात्रों ने हिस्सा लिया। भाषण और खेलों में पुरस्कार प्राप्त करने वाले छात्रों को पुरस्कार देने का कार्यक्रम रविवार को शाम पांच बजे होने वाला था। इसके लिए नियोजित अध्यक्ष और बहिष्कृत वर्ग के नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर बार-एट लॉ डॉ. सोलंकी, कदम आदि लोगों के साथ पांच बजे पहुंच गए। अध्यक्ष के स्वागत के लिए गवर्नमेंट डी.सी. होस्टल और डी.सी. मिशन संस्थाओं के बालवीरों की टुकडि़यां दरवाजे के पास सज्ज थीं। अध्यक्ष के द्वार के पास पहुंचने पर सुभेदार घाटगे के नेतृत्व में बालवीरों की टोली ने सलामी दी। उस समय डॉ. अम्बेडकर की जयजयकार से माहौल गूंज उठा और उस जय-जयकार के बीच ही मेहमान आश्रम में प्रविष्ट हुए। फिर अध्यक्ष, छात्रों और अतिथियों का ग्रुप फोटो लिया गया। और फिर छह बजे पुरस्कार समारोह संपन्न हुआ।

अतिथियों में डॉ. सोलंकी, प्रि. तावडे़, रा. श्रीधरपंत तिलक, रा. संगमनेरकर, कदम, ऐदाले, बाराथ, भंडारे, राजभोज, लांडगे, वायदंडे, डी.सी. मिशन के रा. पाताडे, सुभेदार, घाटगे बंधु, गायकवाड़ और सेवासदन की प्रौढ छात्राएं ट्रेनिंग कालेज के प्रौढ़ छात्र आदि ही प्रमुख रूप से नजर आ रहे थे। बाद में जॉ सेक्रेटरी रा. रणपिसे जी ने विभिन्न प्रतियोगिताओं का मार्मिक विवेचन किया और अध्यक्ष ने अपने हाथों से विजेताओं को पुरस्कार दिए। इसके पष्चात् अध्यक्ष का भाषण हुआ। भाषण में उन्होंने बहिष्कृत वर्ग की मौजूदा भयानक और चिंताजनक परिस्थितियों का वर्णन करके कहा कि इस विषम परिस्थिति में बहिष्कृत वर्ग के छात्र कैसे अपने कर्तव्य को निभाते हैं, इस पर ही बहिष्कृत वर्ग का भविष्य निर्भर है। इसके साथ ही उन्होंने बहिष्कृत वर्ग की शिक्षित महिलाओं से अपील की कि वे अपने शील और कर्त्तव्य को निभाते हुए समाज की प्रगति में योगदान दें। जब उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि शिक्षित होने पर भी अस्पृश्य माने जाने