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अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता
अमरावती के इंद्रभुवन थियेटर में वर्हाड प्रदेश अस्पृश्य परिषद् का दूसरा अधिवेशन दिनांक 13 और 14 नवंबर, 1927 को आयोजित किया गया था।
दिनांक 13 नवंबर, 1927 को सभा के नियोजित अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बडनेरा में गवई एम.एल. सीत्र द्वारा स्वागत करने के बाद अध्यक्ष और अन्य लोग दोपहर डेढ बजे अमरावती पहुंचे। स्टेशन पर स्पृश्य और अस्पृश्यों की भारी भीड़ जमा थी। ठीक साढे़ तीन बजे सभा के कामकाज की शुरूआत हुई। पहले अस्पृश्य समाज के कुछ बच्चों ने अपनी मधुर आवाज में स्वागत गीत गाए। डॉ. पंजाबराव देशमुख ने जल्दी होने वाले श्री अंबादेवी मंदिर सत्याग्रह की दृष्टि से आज के सभा का महत्त्व प्रतिनिधियों को समझाया। बाद में डॉ. अम्बेडकर का परिचय कराकर, उन्हें अध्यक्ष पद स्वीकार करने का अनुरोध किया। मोर्शी के सुप्रसिद्ध गैर-ब्राह्मण नेता नानासाहब अमृतकर, सत्याग्रह समिति के सचिव श्री नाईक और अध्यक्ष गवई एम.एल.सी. ने उसका अनुमोदन किया। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अपना स्थान ग्रहण किया। प्रारंभ में आज की सभा का अध्यक्ष बनाने के लिए स्वागत मंडल और प्रतिनिधियों के आभार प्रगट कर उन्होंने अपना भाषण दिया।
उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, न जानपदिकं दुखमेक; शोजितुमर्हति।
अशोचन्प्रति कुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम्।।
जो दुःख सार्वजनिक है उसका शोक करते रहना उचित नहीं है। उसके लिए रोते बैठने के बजाय ज्ञानी पुरूषों को उसके प्रतिकार के लिए जो समाधान सूझे वह करना चाहिए। ते हरेद्वेषिणः पापाः धर्मार्थ जन्म युद्धरेः।।
अपने कर्म त्यागकर केवल हरि-हरि करते रहने वाले लोग हरि के विरोधी और पापी हैं क्योंकि हरि का जन्म तो धर्मरक्षा के लिए हुआ है। अस्पृश्य और स्पृश्य एक ही धर्म के लोग हैं, यह बात दोनों पक्ष मानते हैं। स्पृश्य लोग अस्पृश्य लोगों से यह कभी नहीं कहते कि वे हिन्दू नहीं हैं। इसके विपरित 1910 की जनगणना में कुछ
* संदर्भ : ‘‘बहिष्कृत भारत’’, 25 नवम्बर, 1927