14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 78

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मुसलमान लोगों की कार्रवाई में यह बात निकली कि अस्पृश्यों की गणना हिन्दुओं में न हो। तब स्पृश्य समुदाय के केवल सुधारवादियों ने ही नहीं तो सनातनियों ने भी जोर देकर कहा कि अस्पृश्य हिन्दू हैं। इसी तरह अस्पृश्यों ने भी स्वीकार किया कि उन्हें गैर-हिन्दूओं में न गिनते हुए हिन्दुओं में ही गिना जाए। यह सही है कि हम एकधर्मीय है यह भावना पुरातन काल से चली आ रही है मगर आज अस्पृश्यों के नजरिए में काफी बदलाव आया है। यदि हम हिन्दू हैं तो अन्य हिन्दुओं को जो अधिकार हैं वे हमें क्यों न हासिल हों? जिस तालाब से वे पानी भरते हैं वहां से हम क्यों नहीं भर सकते? जिस मंदिर में वे जाकर पूजा करते हैं वहां हमें क्यों नहीं प्रवेश मिलता? इस तरह के समता के सवाल वे उठा रहे हैं और इन सवालों के मुताबिक जो अधिकार उन्हें प्राप्त होने चाहिएं, उसे हासिल करने करने के लिए वे प्रयत्न कर रहे हैं। जब कोई व्यक्ति पुराने को छोड़कर नए के पीछे जाने लगता है तो उसके मन में यह संदेह पैदा होता ही है कि वह जो कार्य कर रहा है वह उचित है कि अनुचित। पुरानी परंपरा से पवित्र हुआ रहता है और इसलिए सभी को उसकी सत्यता का विश्वास होता है। नए की परंपरा नहीं होती और इसलिए वह दिखने में कितना ही सुंदर हो तो भी लोग उसका अनुकरण करने में झिझकते हैं। समान अधिकार का आग्रह करने वाले अस्पृश्यों की भी इस नई नीति के बारे में इसी तरह की मनस्थिति होना स्वाभाविक है कि इसके पहले हम कभी मंदिर में नहीं गए! कभी तालाब पर नहीं गए! वैसा करने के लिए अब लोग आग्रह कर रहे हैं। परंतु क्या हमारा यह आग्रह सत्याग्रह होगा? यदि ऐसी शंका अस्पृश्यों के मन में उठती है तो वह मनुष्य स्वभाव के अनुरूप ही है। किसी काम में सफलता मिलेगी या नहीं वह जितना साधनों पर अवलंबित है उतना ही वह कार्य के नैतिक स्वरूप पर भी निर्भर होता है। कार्य के मूल में अगर सत्य है तो उसकी सफलता के लिए विशेष चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि आखिर में हमेशा सत्य की ही विजय होती है। यदि कार्य के मूल में असत्य हो तो उसकी सफलता कठिन होती है। इसलिए हरेक अस्पृश्य को हमारे कार्य के नैतिक स्वरूप के बारे में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। यह जानने के लिए ही हमें इस बात पर विचार करना जरूरी है कि मंदिर प्रवेश का अस्पृश्यों का आग्रह सत्याग्रह है या दुराग्रह है।

सत्याग्रह के बारे में पहली बात यह है कि यह तय किया जाए कि सत्य क्या है और असत्य क्या है। क्योंकि अगर सत्य क्या है यह निश्चित रूप से तय नहीं किया गया तो सत्याग्रह की इमारत डांवाडोल ही रहेगी। यदि सत्याग्रही के मन में यह विश्वास नहीं हो कि उसका आग्रह सत्याग्रह है तो वह सत्याग्रह करेगा कैसे? क्योंकि, सत्याग्रह की सफलता हमेशा सत्याग्रही व्यक्ति के आत्मबल पर निर्भर होती है। यह आत्मबल उसमें प्रकट होने के लिए यह जरूरी है कि उसमें यह भावना हो कि वह