62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जो कर रहा है वह सत्य है। इस भावना के प्रति अगर संशय रहा तो उसमें सत्याग्रह के लिए आवश्यक आत्मबल प्रकट नहीं होगा। इसलिए सत्याग्रही व्यक्ति को इस बात का विश्वास होना चाहिए कि सत्य क्या है। अगर संक्षेप में कहूं तो मेरी राय में जिस कार्य से लोकसंग्रह होता है वह सत्कार्य है और उसके लिए किए जाने वाले आग्रह को सत्याग्रह कहना चाहिए। अब लोकसंग्रह के बारे में मतभेद होना संभव है। एक को जो कार्य लोकसंग्रह का लगता है वही दूसरे को लोकविग्रह का लगेगा। फिर भी एक बात माननी पडे़गी कि यदि करने वाले की बुद्धि शुद्ध न हो यानी यदि वह स्वार्थपूर्ण उद्द्ेश्य से काम करने के लिए प्रवृŸा हुआ है तो ही उसका झुकाव लोकविग्रह के कामों की तरफ होगा। वहीं अगर करने वाले के मन में समभाव जागृत है तो उसके हाथों से लोकविग्रह का काम कभी होगा ही नहीं। क्योंकि स्वार्थ न होने के कारण उसकी इच्छा लोकसंग्रह ही की होगी इसलिए इन दो सिद्धांतों के आधार पर हमारी सत्याग्रह की परिभाषा यह है कि जहां समभाव है वहां लोकसंग्रह है और जहां लोकसंग्रह है वहां सत्कार्य है और ऐसे कार्य के लिए जो आग्रह होता है वह सत्याग्रह है।
यह सोच हमारी नहीं है। इसे हमने गीता से लिया है। कुछ लोगों को इस बात का आश्चर्य लगेगा कि हम सत्याग्रह के लिए गीता को आधार बना रहे हैं। सामान्य तौर पर लोगों का यह मानना है कि सत्याग्रह गीता का विषय नहीं है, लेकिन हमारी दृष्टि से यह समझ गलत है। सत्याग्रह ही गीता का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। यदि हम गीता के उपदेशों को ठीक से समझें तो हमारे कहने की सत्यता सहज रूप से समझ में आ जाएगी। गीता में अर्जुन ने कौन-सा सवाल किया और उस पर श्रीकृष्ण ने क्या जवाब दिया इस तरफ अगर कोई ध्यान देगा तो उसे दिखाई देगा कि अर्जुन जब रथ के नीचे बैठ गया तब भगवान श्रीकृष्ण ने उससे कहा, बैठो मत! तुम्हारे राज्य अधिकार को जिन्होंने छीना है उनसे युद्ध करो! तब अर्जुन ने उनसे सवाल किया कि बताओ, कि आप जो आग्रह कर रहे हैं क्या वह सत्याग्रह है? उसके इसी एक सवाल के जवाब में भगवान ने गीता कही है। इसलिए गीता ग्रंथ का सत्याग्रह के अलावा कोई दूसरा मुख्य प्रतिपाद्य विषय हो ही नहीं सकता। अस्पृश्य लोग स्पृश्यों के बराबर अधिकार का जो आग्रह रखते हैं वह सत्याग्रह है या नहीं यह साबित करने के लिए हमने जो गीता का आधार लिया है वह इसलिए क्योंकि गीता सत्याग्रह की एक मीमांसा है। लेकिन इस कार्य के लिए गीता का हवाला देने की एक और वजह है। वह यह कि स्पृश्य और अस्पृश्य दोनों ही इसे धर्मग्रंथ मानते हैं। हम अगर किसी और ग्रंथ का हवाला देते तो स्पृश्य लोग यह कहने से नहीं चूकते कि हमें यह स्वीकार्य नहीं है। यदि अस्पृष्य लोगों द्वारा शुरू किया गया सत्याग्रह गीता की कसौटी पर
खरा उतरता है तो स्पृश्यों के लिए उसका विरोध कर पाना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसा करना एक तरह से गीता को ही अस्वीकार करने जैसा होगा।