14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 80

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अब हम देखते हैं कि अस्पृश्यों का सत्याग्रह क्या गीता की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं। पहले हम जानें कि हमारा शुरू किया हुआ कार्य क्या लोकसंग्रह का कार्य है? कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि अस्पृश्यता को खत्म कर हम स्पृश्य बनें इतना ही इस आंदोलन का उद्देश्य है लेकिन ऐसा मानना गलत है। अस्पृश्यता से केवल अस्पृश्यों का ही नुकसान हुआ हो ऐसा नहीं है उससे स्पृश्यों का भी और इस देश का भी बेहद नुकसान हुआ है। अस्पृश्यता के कलंक से केवल अस्पृश्य ही कलंकित नहीं हुए हैं तो स्पृश्य भी कलंकित हुए हैं। जिसे छोटा माना जाता है उससे उसका अपमान तो होता है मगर जो छोटा मानते हैं उनकी भी नीतिमŸा कम होती है। यदि अस्पृश्य लोग अस्पृश्यता के दलदल से निकल कर आत्मस्वातंत्र्य प्राप्त करते हैं तो वे अपनी उन्नति तो करेंगे ही साथ ही अपने पराक्रम, बुद्धि और कर्तृत्व से देश की प्रगति के भी कारक होंगे। इस दृष्टि से देखें तो अस्पृश्यता उन्मूलन का आंदोलन केवल पतितोद्धार का आंदोलन न होकर सही मायने में लोकसंग्रह का आंदोलन है। यदि अस्पृश्य केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रख कर केवल अपना ही उद्धार करना चाहते हैं तो उन्हें सत्याग्रह जैसे कठिन असिधाराव्रत को अपनाने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि, जिस मनुष्यता के लिए, जिस समता के व्यवहार के लिए वे प्रयत्नशील हैं तो उस मनुष्यता को प्राप्त करने के लिए उन्होंने अगर धर्मांतर किया तो वे अपने उद्देश्य में सहज रूप से सफल हो जाएंगे। और अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए उन्हें जो शक्ति खर्च करनी पड़ रही है उसे वे अपने शैक्षणिक और आर्थिक हितों के लिए उपयोग में ला सकेंगे। हिंदू धर्मावलंबियों में एक बड़ी अजीब बात ह,ै वह यह कि जब तक कोई व्यक्ति हिंदू समाज का घटक होता है तब तक ही उस पर हिंदू धर्म द्वारा निर्दिष्ट श्रेय और निश्रेय, पाप और पुण्य, और छुआछूत के यम-नियम लागू होते हैं। लेकिन वही आदमी यदि हिंदू धर्म से संबंध तोड़ कर अलग धर्म और समाज का अंग बन जाता है तो हिंदू धर्म द्वारा निर्दिष्ट श्रेय और निश्रेय, पाप और पुण्य, और छुआछूत के यम-नियम उस पर लागू नहीं होते उसके साथ मानव धर्म द्वारा निर्दिष्ट श्रेय और निश्रेय, पाप और पुण्य, और छुआछूत के यम-नियमों के अनुसार व्यवहार किया जाता है। यह इस बात से ही स्पष्ट है कि स्पृश्य लोग अस्पृश्यों को जिस तरह से दूषित मानते हैं उस तरह वे कुŸो-बिल्लियों या मुसलमानों को दूषित नहीं मानते। क्योंकि कुŸो-बिल्लियों या मुसलमानों का हिंदू धर्म से संबंध नहीं है इसलिए उनके साथ मानव धर्म के नियमों के अनुसार बर्ताव किया जाता है। ऐसा नहीं है कि अस्पृश्य इस

खूबी को नहीं जानते। उन्हें पूरी तरह से पता है कि कोई अस्पृश्य हिंदू धर्म में रहता है तो उसे स्पृश्य हिंदुओं द्वारा कमतर समझा जाता है लेकिन वही अगर ईसाई या मुसलमान हो गया तो वही हिंदू लोग उसके साथ अपनी बराबरी का व्यवहार करते हैं। फिर भी अस्पृश्यता निवारण का यह आसान रास्ता न अपनाकर और दूसरे धर्म में जाकर हिंदू धर्म को कमजोर करने के बजाय उसी में ही रह कर अपने पास जितनी