14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 81

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शक्ति है, उसे लगा कर अपनी मनुष्यता हासिल करने का उन्होंने जो निश्चय किया है उससे यह स्पष्ट है कि उन्होंने जो कार्य शुरू किया है वह केवल अपने कल्याण तक ही सीमित नहीं है अपितु वह हिंदू धर्म के कल्याण के लिए भी है। इसी तरह कोई यह भी नहीं कह सकता कि जो अस्पृश्य यह आंदोलन कर रहे हैं उनमें समभाव नहीं हैं। क्योंकि अस्पृश्यों की मांग विशेषाधिकार की नहीं समान अधिकार की है। अस्पृश्य यह मांग नहीं कर रहे कि हिंदुओं को जो अधिकार हैं वे केवल उन्हीं को प्राप्त हों, औरों को नहीं। उनकी मांग समता की मांग है कि स्पृश्यों को जो अधिकार हैं, वैसे ही अधिकार उन्हें भी प्राप्त हों। इसलिए भी गीता की बताई कसौटी पर भी अगर कसा जाए तो अस्पृश्यों के आग्रह को सत्याग्रह ही कहना पडे़गा।

बहुत से समाजविरोधी लोग ऐसा कहते हैं कि अस्पृश्यों का कार्य राष्ट्र कार्य है यह हम स्वीकार करते हैं, मगर अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार ही नहीं है। इनमें से कुछ लोगों की दलीलें काफी मनमोहक लगती हैं। उन्हें पढ़कर यह लगता है कि हमारे तर्क, हमारा पक्ष कमजोर हैं। इन विरोधी लोगों का कहना है कि अगर अस्पृश्य लोग यह सोचते हैं कि स्पृश्यों के मंदिर में जाने से ही उपासना होती है तो यह सही नहीं है, इसलिए अस्पृश्य समाज का मंदिर प्रवेश का प्रयास गलत है। क्योंकि जिस तरह नमाज पढ़ना मुसलमानों में धर्मपालन का ही एक चिह्न हैं उस तरह स्पृश्यों के मंदिरों में देवताओं के दर्शन करना ही हिंदू धर्म का लक्षण (पहचान) नहीं है। हिंदू धर्म में साकार की प्रत्यक्ष पूजा, निराकार का ध्यान और ईश्वर का केवल नामोच्चार उपासना के विविध मार्ग बताए गए हैं। इन उपासनाओं में से कोई भी उपासना अस्पृश्य ना करें। ऐसा हमने कभी नहीं कहा है। हिंदू धर्म के हिसाब से किसी भी एक उपासना को करना पर्याप्त है। जब तक उपासना के और उपास्य की नाना विधियां हिंदू समाज में हैं तब तक अस्पृश्यों के यह कहने में कोई तुक नहीं है कि स्पृश्यों के मंदिर में जाने से ही उपासना घटित होती है। इन विरोधियों को हमारा जवाब है कि हिंदू समाज में उपासना के कई प्रकार हैं और उनमें से किसी एक प्रकार की उपासना करें तो भी हिंदू धर्म का पालन होता है, इसे हम मान्य करते हैं तो भी अगर कोई साकार की प्रत्यक्ष पूजा करना चाहता है तो उसे उसकी छूट क्यों नहीं होनी चाहिए? उपासना का यह मार्ग एक के लिए खुला तो दूसरे के लिए बंद क्यों है? और जिन अस्पृश्यों के लिए वह बंद है उन्होंने अगर उसे खोलने का आग्रह किया तो क्या वह सही नहीं होगा? जहां उपासना के कई प्रकार हैं वहां किसी व्यक्ति को अपने लिए उचित उपासना निर्धारित करने का अधिकार होना ही चाहिए। अस्पृश्य लोग इस अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका पक्ष कमजोर है कहना उनके साथ शुद्ध छल है।

इन विरोधियों की दूसरी दलील यह है कि स्पृश्य लोग अस्पृश्यों को अपने मंदिरों में देवताओं के दर्शन के लिए नहीं जाने देते हैं तो भी हरेक को अपने देवता की