14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 82

65

स्थापना की स्वतंत्रता है। जिन अस्पृश्यों को साकार के प्रत्यक्ष पूजन की उपासना पद्धति पसंद हो वह अलग मूर्ति की स्थापना करे स्पृश्य हिंदू समाज ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी है केवल उपासना के लिए अस्पृष्यों को स्पृश्यों के देवताओं पर अधिकार जताने की कोई जरूरत नहीं है। जो पढे़-लिखे मूर्ख यह दलील देते हैं उनसे हमारा सवाल है कि रेलवे अधिकारी अगर रेल में गोरे लोगों के लिए अलग, काले लोगों के लिए अलग डिब्बों का आरक्षण करते हैं तो यह व्यवस्था आप लोगों को स्वीकार नहीं होती। और फिर आप उसके खिलाफ शिकायत क्यों करते हैं? रेलवे अधिकारियों ने यदि गोरे लोगों के लिए अलग डिब्बा आरक्षित किया हो तो भी आपको अन्य डिब्बों में यात्रा करने की स्वतंत्रता है। आपको यात्रा करनी है और अलग डिब्बों में बैठ कर जाने की आपको आजादी है। फिर गोरे लोगों के लिए आरक्षित डिब्बों पर आप अपना हक क्यों जताते हैं? इसका एक ही उŸार है। वह यह कि यह सवाल केवल यात्रा तक सीमित नहीं है, समानता का है। उपरोक्त दलील को अस्पृश्य भी इसी तरह का जवाब देते हैं। अस्पृश्य लोग मंदिर प्रवेश पर जो जोर दे रहे हैं वह केवल साकार के प्रत्यक्ष पूजन के लिए नहीं है। अस्पृश्य लोगों को मंदिर में प्रवेश करके यह सिद्ध करना है कि उनके प्रवेश से मंदिर दूषित नहीं होते। या उनके द्वारा मंदिर की मूर्ति को स्पर्श करने से मंदिर की मूर्ति की पवित्रता कम नहीं होती। यह सिद्ध करने के लिए अलग देवता की स्थापना से बात नहीं बनती। इसी कारण जिस देवता को पवित्र मान कर स्पृश्य लोग उसकी उपासना करते हैं उस देवता की उपासना करने का आग्रह अस्पृश्य लोग कर रहे हैं, उसके बगैर अस्पृश्यों का उद्देश्य पूरा नहीं होता। अस्पृश्यों का कहना है केवल पापियों के स्पर्ष से देवताओं की पवित्रता कम हो सकती है, हमारे छूने से वह कम नहीं होगी, क्योंकि हम पापी नहीं हैं। इससे यह स्पष्ट है कि उनके आंदोलन का मुख्य सिद्धांत यह है कि भगवान के भक्तों में कोई पवित्र और कोई अपवित्र ऐसा भेदभाव नहीं है। और इसीलिए वे स्पृश्यों द्वारा स्थापित मूर्ति की उपासना करने का आग्रह कर रहे हैं। यह आग्रह सत्याग्रह नहीं है ऐसा कौन कहेगा?

अस्पृश्यों के सत्याग्रह के खिलाफ उपरोक्त आपिŸायां प्रकट करके ही वे लोग चुप नहीं बैठे। उन्होंने कुछ व्यावहारिक आपिŸायां भी गढ़ डाली हैं। इस मुद्दे पर उनका कहना यह है कि संगठन वाले जब कहते हैं कि स्पृश्यों के मंदिर अस्पृश्यों के लिए खुलने चाहिए तो बात अलग है। और जब अस्पृश्य स्पृश्यों से कहते हैं कि आप अपने मंदिर हमारे लिए खोल दीजिए नहीं तो सत्याग्रह करके उन पर अधिकार कर लेंगे तो यह कहना अलग है। क्योंकि स्पृश्य-अस्पृश्य का भेदभाव भले ही गलत हो वह अनंतकाल से चल रहा है या वह उचित न्याय पर आधारित हो, लेकिन यह भेदभाव पैदा होने के बाद हम स्पृश्यों ने मंदिर बनाए हैं, चलाए हैं या उनकी देखरेख की है तो अस्पृश्य उस पर अपना अधिकार कैसे जता सकते हैं? अगर वे यह