66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अधिकार जताने लगे तो क्या उसे न्यायोचित कहा जा सकता है? अस्पृश्यों के सत्याग्रह का मसला स्पृश्य और अस्पृष्य का केवल मसला नहीं है वरन् न्याय और अन्याय का मसला भी है इस सोच पर इन विरोधियों का सारा दारोमदार है। उनकी नजर में अमरावती के अंबादेवी मंदिर के पंचों ने अस्पृश्यों की अर्जी कूडे़दान में फेंक दी हो तो भी रीति-रिवाज, परंपराएं और कानून हमेशा उनके पक्ष में हैं क्योंकि सारे समाज में अन्य मामलों में अस्पृश्यता खत्म हो गई हो तो भी एक भी पंच कहे कि यह परंपरा नहीं है तो कायदे के अनुसार और न्याय के अनुरूप वह अस्पृश्यों पर पाबंदी लगा सकता है। यह ऐतराज भी एकदम नादानी भरा है। अस्पृश्यों को यह मानना पडे़गा कि स्पृश्यों ने मंदिर बनाए, उनकी देखभाल की लेकिन कोई इस बात को स्वीकार नहीं कर सकता कि केवल इस वजह से अस्पृश्यों को यह कहने का अधिकार नहीं है कि स्पृश्यों ने अपने मंदिर उनके लिए खोलने चाहिएं। क्योंकि यह मंदिर भले ही स्पृश्यों ने बनाए हों मगर वे हिंदू धर्म के हैं और हिंदू धर्मावलंबियों के लिए बनाए गए हैं यह कार्य भले ही किसी एक ने किया हो मगर वह सभी हिंदुओं के उपयोग के लिए किया है इसलिए जो भी हिंदू है उन सभी को इस मंदिर में जाकर पूजा करने का अधिकार है इतना ही नहीं हिंदुत्व जितना स्पृश्यों का है उतना ही अस्पृश्यों का भी है। इस हिंदुत्व की प्राणप्रतिष्ठा जितनी वशिष्ठ जैसे ब्राह्मण, कृष्ण जैसे क्षत्रिय, हर्ष जैसे वैश्य और तुकाराम जैसे शूद्र ने की उतनी ही वाल्मिकी, चोखामेला, और रोहिदास जैसे अस्पृश्यों ने भी की। इस हिंदुत्व की रक्षा के लिए हजारों अस्पृश्यों ने अपनी मनुष्यता दांव पर लगाई है व्याध गीता के अस्पृश्य द्रष्टा से लेकर खर्डा की लड़ाई के सिदनाक महार तक जिन भी अस्पृश्यों ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए अपनी जान लड़ा दी ऐसे लोगों की संख्या कुछ कम नहीं है। स्पृश्य और अस्पृश्य दोनों ने योगदान देकर हिंदुत्व की इमारत बनाई है उस पर हमला होने पर जान की परवाह किए बगैर उसकी रक्षा की है उस हिंदुत्व के नाम पर बनाए गए मंदिर जितने स्पृश्यों के हैं उतने ही अस्पृश्यों के भी हैं वह जितनी स्पृश्यों की विरासत है उतनी ही अस्पृश्यों की। यह कभी नहीं कहा जा सकता कि एक उस विरासत का अधिकारी है और दूसरा नहीं। अस्पृश्य लोग अलग नहीं हैं। वे हिंदू हैं। हिंदू धर्म उनका है और वे हिंदू धर्म के हैं। इसी आधार पर सभी को यह स्वीकार करना पडे़गा कि हिंदुओं के मंदिर अस्पृश्यों की विरासत हैं। यदि इस विरासत को स्वीकार कर लिया गया तो पुराने रीति-रिवाजों का सवाल शेष ही नहीं रह जाता। कारण यह है कि कानून की दृष्टि से देखा जाए तो सार्वजनिक मामलों में व्यक्तिगत अधिकार किसी से पंजीकृत करके नहीं पाए जा सकते वे हर एक को पैदाइशी प्राप्त हैं। अगर उन्होंने उसका इस्तेमाल नहीं भी किया हो या उनके इस्तेमाल में अंतराल रहा हो तो इतने भर से वह खत्म नहीं हो जाता। यह कहना जितना मूर्खतापूर्ण है कि कोई व्यक्ति अगर किसी राह पर नहीं चला तो भविष्य में भी उस रास्ते पर वह फिर कभी नहीं जा सकता। उतना ही मूर्खतापूर्ण