14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 84

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यह कहना भी है कि जो कभी सार्वजनिक तालाब या मंदिरों में पहले कभी नहीं गया वह अब भी नहीं जा सकता। इसलिए न्याय की तराजू का यह पलड़ा हमारी तरफ झुक रहा है और हमारा आग्रह सत्याग्रह है इस बारे में किसी अस्पृश्य के मन में किसी तरह की शंका नहीं होनी चाहिए। वह यह भी मान सकते हैं कि हिंदू धर्म की उन्नत अवस्था में ले जाकर वह सारे मानवों का धर्म बने वह मानव धर्म का पर्याय बन जाए हम इसके लिए अवतरित देवदूत हैं।

अब तक हमने जो चर्चा की कि अस्पृश्यों को समान अधिकार हासिल कराने का जो आग्रह है, वह सत्याग्रह है, या नहीं। अब हम विचार करते हैं कि अस्पृश्य लोग कैसे इस सत्याग्रह को करें? पहले सत्याग्रह का तरीका निश्चित होना चाहिए। महात्मा गांधी आधुनिक युग में सत्याग्रह के आंदोलन के पुरस्कर्ता हैं। सभी यह मानते हैं कि महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की जो राह बताई उसके अलावा कोई दूसरी राह हो ही नहीं सकती। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का जो रास्ता चुना उसमें हिंसा के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी सोच के मुताबिक जहां हिंसा है वहां सत्याग्रह है ही नहीं। हमें लगता है कि महात्मा गांधी का यह कहना तर्कपूर्ण है, इस बारे में एक राय होना, आम सहमति होना संभव नहीं है। किसी व्यक्ति का आग्रह सत्याग्रह है या दुराग्रह है, यह आग्रह की सफलता के लिए अपनाए गए साधनों पर निर्भर नहीं होता वह पूरी तरह उस कार्य के नैतिक स्वरूप पर निर्भर होता है। अगर यह कार्य सत्कार्य है तो उसके लिए किए गए आग्रह को सत्याग्रह कहना चाहिए और अगर वह कार्य असत्य होगा तो उसके लिए किए गए आग्रह को दुराग्रह कहना पड़ेगा। हिंसा और अहिंसा तो केवल उस आग्रह की सफलता के लिए अपनाए गए साधन हैं जिस तरह कर्म और कर्ता के अनुसार क्रियाएं बदलती हैं, उस तरह साधनों के कारण आग्रह का नैतिक स्वरूप नहीं बदलता। अगर कोई दुराग्रही अपने आग्रह को सफल बनाने के लिए अहिंसा का मार्ग अपनाए तो उसके दुराग्रह को सत्याग्रह नहीं कहा जा सकता। या अगर किसी सत्याग्रही ने सत्याग्रह की सफलता के लिए हिंसा की तो केवल इस आधार पर उसके सत्याग्रह को दुराग्रह नहीं कहा जा सकता। अगर ऐसा होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सत्याग्रह की सफलता के लिए हिंसा का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर किया उसे क्या कहा जाए? क्या वह पापात्मा था? ऐसा लगता नहीं कि कोई भी हिंदू ऐसा कहने के लिए तैयार होगा। और अगर कोई ऐसा कहने के लिए तैयार हो भी गया तो उसकी बात सभी को रास आएगी ऐसा नहीं कहा जा सकता। कारण यह है कि भले ही अहिंसा परमो धर्माः कहा जाता हो। मगर हर जगह अहिंसा धर्म का पालन करना संभव नहीं होता। हमें आंखों से भले ही दिखाई न दे मगर तर्क से यह समझा जा सकता है कि इस दुनिया में इतने सूक्ष्म जंतु व्याप्त हैं कि हमारी आंखों की पलकें झपकने भर से भी इन जंतुओं के