14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 85

68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हाथ-पांव टूट जाते हैं। हवा, पानी, फल आदि सभी स्थानों पर जो सैंकड़ों सूक्ष्म जंतु हैं उनकी हत्या कैसे रोकी जा सकती है? डॉ. जगदीशचंद्र बोस ने जो वैज्ञानिक शोधकार्य, आविष्कार किया है, उससे साबित होता है कि पेड़-पौधों में भी जीव है। फिर इन पेड-पौधों को नष्ट करने वाले ब्राह्मण और नाक में कपड़ा बांध कर घूमने वाले जैन तीर्थंकर अहिंसक होने का दावा कैसे कर सकते हैं? इसी तरह यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि हर जगह अहिंसा से काम चल सकता है। मान लीजिए, कि कोई आपकी जान ले ले या आपकी पत्नी या बेटी का बलात्कार करने या आपके घर में आग लगाने या आपकी सारी दौलत हड़पने के लिए कोई दुष्ट व्यक्ति हाथ में शस्त्र-हथियार लेकर आता है और आपके पास और कोई रास्ता नहीं है, तो आप क्या करेंगे? हम ऐसे दुष्ट आदमी की अंहिंसा परमो धर्मा का जाप करते हुए उपेक्षा करें। या भलमनसाहत से न समझने पर उसे सबक सिखाए। कोई भी इन दोनों में से दूसरे मार्ग को अपनाए बगैर नहीं रह सकता और कोई नहीं कह सकता कि उसकी करनी शास्त्रों के विरुद्ध है क्योंकि ऐसे समय हत्या का पाप हत्यारे को नहीं लगता। शास्त्रकार कहते हैं कि जो दुष्ट मरता है वह अपने अधर्म से मारा जाता है। केवल प्राचीन विधिवेŸाओं ने ही नहीं तो आधुनिक फौजदारी कानून में भी आत्मसंरक्षण के लिए हिंसा करने के अधिकार को स्वीकार किया है। हिंसा करना भले ही गलत हो मगर यदि उसके बगैर आत्मरक्षा संभव नहीं है तो हिंसा को उचित समझा जाता है। भ्रूण हत्या को बहुत गलत माना गया है मगर वही बच्चा अगर मां की जान के लिए

खतरा बन जाए तो उसे काट कर निकालने पर भी कोई ऐतराज नहीं करता। यही दलील सत्याग्रह की सफलता पर भी लागू करना जरूरी है। और यदि सत्याग्रही आदमी को हिंसा करनी पडे़ तो वह यह कहते हुए क्षम्य मानी जाएगी कि उसके सामने और कोई चारा ही नहीं था। इस दृष्टि से गांधी का सत्याग्रह का मार्ग अव्यावहारिक सिद्ध होता है। मगर यह कहना भी भ्रामक है कि वह अहिंसक है। अगर हिंसा का केवल यही सीमित अर्थ किया जाए कि हिंसा यानी हत्या। तभी हिंसा और अहिंसा में कोई फर्क किया जा सकता है। लेकिन हिंसा का अर्थ केवल दूसरों की जान लेना ही नहीं तो दूसरे प्राणियों के शरीर और मन को चोट पहुंचाना भी इसमें शामिल है। अहिंसा याने किसी भी सचेतन प्राणि को दुख न दिया जाए। यदि अहिंसा के इस व्यापक अर्थ को अपनाया जाए तो महात्मा गांधी की अहिंसा एक तरह की हिंसा ही है, ऐसा कहना पडे़गा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी सत्याग्रह की पद्धति से दूसरे प्राणियों के शरीर पर भले ही आघात न होता हो मगर उनकी आत्मा को या मन को दुख पहुंचता है। गांधीजी का सत्याग्रही आदमी मानव हत्या भले ही न करे तो भी अपने आग्रह के कारण विरोधियों के मन की शांति को भंग करता ही है। इसलिए यह कहना पड़ता है कि महात्मा गांधी का यह कहना अपूर्ण है कि उनके सत्याग्रह से बिल्कुल हिंसा नहीं होती। इसलिए सत्याग्रही को उसकी सफलता के