14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 86

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लिए यह नीति अपनानी चाहिए कि जब तक संभव हो अहिंसा और जरूरत पड़ने पर ही हिंसा यह नैतिकता की दृष्टि से भी योग्य है। गांधी जी ने अहिंसा पर जो इतना जोर दिया है वह केवल इसलिए नहीं कि गांधीजी अहिंसावादी हैं। जोर देने के पीछे उनके कारण एकदम अलग हैं। महात्मा गांधी अपनी सत्याग्रह की मीमांसा में कहते हैं कि सत्य क्या है और उसे कैसे तय किया जा सकता है, इस बारे में कोई निश्चित कसौटी नहीं बनाई जा सकती। उन्हें लगता है कि जिसे वह सत्याग्रह कहते हैं उसे ही दूसरे लोग दुराग्रह कह सकते हैं उन्होंने अपने यह विचार हंटर कमेटी के सामने पेश किए गए लिखित प्रतिवेदन में व्यक्त किए हैं। उनकी राय है कि जहां सत्य को लेकर वास्तविक मतभेद हो सकते हैं वहां हिंसा करना उचित नहीं होगा। और इस कारण ही उन्होंने अपने सत्याग्रह में हिंसा को स्थान नहीं दिया। इससे स्पष्ट है कि कार्य की सत्यता के बारे में दुविधा न हो तो उसके लिए शुरू किए गए सत्याग्रह की सफलता के लिए हिंसा करनी पडे़ तो गांधीजी उस पर ऐतराज नहीं करेंगे। यह विवेचन सिर्फ इसलिए किया गया है कि हिंसा, सत्याग्रह के नैतिक स्वरूप में बाधक नहीं है इस मुद्दे की इससे ज्यादा चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि सत्याग्रह को सफल बनाने के लिए हिंसा करने पर कोई सैद्धांतिक ऐतराज न हो तो भी आज की स्थिति में ऐसा करने के लिए किसी के पास फुर्सत नहीं है। इस देश की सारी जनता निःशस्त्र होने के कारण सत्याग्रह की सफलता के लिए अहिंसा का एकमात्र रास्ता ही खुला है। और सत्याग्रह करने वाले अस्पृश्यों के लिए इस एक ही रास्ते के भरोसे चलना मजबूरी है। और इसके अलावा अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सके कि अस्पृश्यों की समस्याओं को हल करने में यह रास्ता अपर्याप्त है क्योंकि अस्पृश्यता निवारण का सत्याग्रह अभियान हाल ही में शुरू हो रहा है। इसलिए जो सत्याग्रह करना है वह अहिंसात्मक ही होगा इसके अलावा और कुछ नहीं यह हम सभी को अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए।

यह सत्याग्रह किसके खिलाफ करना है इसके बारे में चर्चा करने की जरूरत है। अस्पृश्य लोग जिन समान अधिकारों की मांग कर रहे हैं वह स्पृश्य लोगों से कर रहे हैं क्योंकि अगर उनके न्यायपूर्ण अधिकारों का कोई विरोध करेगा तो वे स्पृश्य लोग ही होंगे। अर्थात्, अस्पृश्य लोगों को ऐसा लगना संभव है कि सत्याग्रह स्पृश्य लोगों के खिलाफ करना है मगर यह सोच पूरी तरह से सही नहीं है। जरा सोचिए, कल अस्पृश्य लोग किसी सार्वजनिक तालाब या किसी सार्वजनिक मंदिर में अपना अधिकार हासिल करने के आग्रह के साथ गए और स्पृश्य लोग उनका प्रतिकार करने के लिए आगे आएं तो क्या होगा इस सवाल पर विचार किए बगैर इस बात को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता कि सत्याग्रह किसके खिलाफ करना है। अस्पृश्य लोग सत्याग्रह करने के लिए तैयार हों और अपेक्षा के अनुरूप स्पृश्य लोग विरोध