14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 87

70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करें और उनके विरोध के कारण शांति भंग होने के आसार नजर आने लगें तो सरकार को शांति स्थापित करने के लिए हस्तक्षेप करना पडे़गा क्योंकि शांति बनाए रखना सरकार का मुख्य कर्त्तव्य है और सरकार हस्तक्षेप करेगी तो कौन सी नीति अपनाएगी, यह जाने बगैर यह तय नहीं किया जा सकता कि सत्याग्रह किसके खिलाफ करना है। सरकार ने अगर अस्पृश्य लोगों का साथ दिया और सरकार न्यायपूर्ण अधिकारों पर अमल करने वाले लोगों को सरकार द्वारा मदद किया जाना न्यायपूर्ण है, और यदि सरकार ने न्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार किया तो यह सवाल चुटकी से हल हो जाएगा। लेकिन यदि सरकार ने ऐसा नहीं किया और पलटी मार ली और वे सत्याग्रही अस्पृश्यों से यह कहने लगे कि आप नए-नए तरीकों से अजीबोगरीब काम करने लगे हैं और इससे शांति भंग हो रही है, और इसलिए हम आपको मना कर रहे हैं। सरकार ने अगर ऐसा आदेश निकाला तो आगे क्या होगा? अर्थात्, यह स्पष्ट है कि अस्पृश्यों को जो सत्याग्रह करना पडे़गा वह दिखने में भले ही स्पृश्यों के खिलाफ हो मगर अंततः वह सरकार के खिलाफ होगा। इसलिए अस्पृश्यों को यह समझ लेना चाहिए कि इस सत्याग्रह में क्या जिम्मेदारी है। संक्षेप में इस सत्याग्रह में हमें मंदिर या तालाब पर जाने के आग्रह को मंजिल तक पहुंचाने के लिए अस्पृश्य लोगों के सामने सरकारी आदेश को भंग करने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा और सरकार सत्याग्रह करने वाले अस्पृष्य लोगों को कानून तोड़ने के जुर्म में जेल में डाले बगैर नहीं रहेगी। इसलिए सत्याग्रह करने वाले अस्पृश्य लोगों को यह जानकर भी सत्याग्रह के लिए अपनी तैयारी करनी चाहिए कि इस काम में आवश्यकता पड़ने पर जेल भी जाना पड़ सकता है। असल में अस्पृश्यता इतनी अपमानजनक बात है कि उसके उन्मूलन के लिए कुछ लोगों को जान भी गंवानी पडे़ तो उसके लिए तैयार रहना चाहिए। स्पृश्य लोग ऐसा मानते हैं कि हमारे स्पर्श से अपवित्र हुई वस्तु गोमूत्र छिड़कने से पवित्र हो जाती है। स्वधर्म के व्यक्ति के स्पर्श से जो दूषित होता है वह पशु के मूत्र को छिड़कने से शुद्ध होता है, यह कहना कठिन है कि मानवीय स्पर्श से दूषित होने की घृणित कल्पना ज्यादा निंदनीय है या उसे पशु के मूत्र से शुद्ध करने की भावना ज्यादा निंदनीय है। लेकिन स्पृश्यों की नजर में एक बात तो स्पष्ट है कि पशु के मलमूत्र में जितनी पवित्रता है उतनी अस्पृश्य लोगों में नहीं है। किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को ऐसा नहीं लगेगा कि यह स्थिति जीवन जीने के योग्य है। केवल जिंदा रहना ही इस दुनिया का एकमात्र पुरुषार्थ नहीं है। जीने के हजार तरीके हैं। काकबलि खाकर कौवे भी बहुत साल जीते हैं। लेकिन कोई इसके जीने को पुरुषार्थ नहीं कहता। आज नहीं तो कल या सौ साल बाद मृत्यु सभी को आने वाली है। तो फिर उससे डरना या उसे लेकर रोना क्यों? यह शरीर आखिरकार नाशवान है। आत्मा के कल्याण के लिए इस दुनिया में जो कुछ भी करना है, उसे करने के लिए यह नाशवान मनुष्य देह ही एक साधन (माध्यम) होने के कारण कहा