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गया है कि ”आत्मनाम सततं रक्षेत दारैरपि धनैरपि“ यह सही है कि शास्त्रों में कहा गया है कि पत्नी, बच्चों या संपिŸा इन सबसे पहले हमें अपनी रक्षा करनी चाहिए। तथापि इस दुर्लभ मगर नाशवान मनुष्य देह की बलि चढा कर इससे भी ज्यादा शाश्वत किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए उदाहरणार्थ - देश, सत्य, उद्देश्य, व्रत, यश, सम्मान या भूतमात्र के लिए अनेक महापुरुषों ने अनेक प्रसंगों पर कर्तव्य की अग्नि में अपने प्राणों की आहुति दी है। हमें लगता हे कि जिस तरह महाभारत में वीरपत्नि विदुला ने अपने पुत्र से कहा था कि बिस्तर में पडे रह कर या सौ वर्ष निरर्थक जीवन गंवाने से बेहतर है कि पल भर के लिए पराक्रम की ज्योति जला कर मर जाए। अब ऐसा समय आ गया है जब हर अस्पृश्य माता को अपने पुत्रों से यह कहना चाहिए। लेकिन अस्पृश्यों को इतना बड़ा असिधाराव्रत पालन करने के लिए कोई नहीं कह रहा। केवल जेल जाने के लिए तैयार रहो, इसके अलावा दूसरे किसी स्वार्थत्याग की मांग नहीं है और इतना ही न हो रहा हो तो यह कहना पडेगा कि अस्पृश्य लोग पुरुष नहीं हिजडे़ हैं। इस कारण महाभारत में कहा गया है -
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जिन पुरुषों को अन्याय पर गुस्सा आता है और जो अपमान सहन नहीं करते उन्हीं को पुरुष कहा जाना चाहिए। जिस पुरुष को गुस्सा नहीं आता वह और नपुंसक एक जैसे हैं। लेकिन हमें उम्मीद है कि अस्पृश्यता निवारण के लिए जान निछावर करने का निश्चय हालांकि थोड़े से अस्पृश्यों का ही है मगर अस्पृश्यता निवारण के लिए जेल जाने का निश्चय बहुत सारे अस्पृश्यों ने किया है और अगर यह सच है तो इस काम में सफलता मिलकर रहेगी। क्योंकि यदि सरकार अन्याय करके अस्पृश्य सत्याग्रहियों को जेल में डाले तो भी वह कितने दिन जेल में रखेगी? और कितने लोगों को जेल भेजेगी? और स्पृश्य लोग भी कितने दिनों तक सरकार का आधार लेते रहेंगे! आखिर में हार होने पर सरकार को भी इस बात पर विचार करना पडे़गा क्योंकि सरकार हुई तो क्या हुआ, उसे भी लोकलाज है और सरकार को कुछ समय तक लोकलाज न भी हो तो उसे ऐसा अनुभव कराना भी अस्पृश्यों के हाथ में है। शांति भंग हो रही है इसलिए अगर सरकार हमारे न्यायपूर्ण अधिकारों के पाने में बाधक बनेगी तो हम विकसित राष्ट्रों के न्याय कोर्ट राष्ट्र संघ में फरियाद करके सरकार को उसके अन्याय के लिए शर्मसार कर सकते हैं। वैसे ही जिन स्पृश्य लोगों की हेकड़ी के लिए, अधिकारों के लिए नहीं सरकार अस्पृश्यों को दंडित कर रही है, उन स्पृश्य लोगों को भी इस पर विचार करना पडे़गा। स्पृश्य लोगों में अस्पृश्यों के प्रति प्रेम न भी हो तो भी उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है ही और इस चिंता के कारण वे झुलस न भी रहे हों तो उन्हें झुलसने के लिए मजबूर करना हमारे हाथों