14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 89

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में है। और वह हम सत्याग्रह के द्वारा कर सकते हैं। यदि स्पृश्य लोगों ने निश्चय किया कि अस्पृश्यों की परीक्षा लेंगे तो ज्यादा से ज्यादा सत्याग्रह असफल होगा। मगर इससे किसका नुकसान होनेवाला है? स्पृश्यों का सत्याग्रह करने के बाद भी यदि अस्पृश्य लोगों को, अगर यह अनुभव हुआ कि हिंदू धर्म उन्हें महत्व नहीं दे रहा तो जो अस्पृश्य लोग आज धकेलने, दुत्कारने पर भी हिंदू धर्म से बाहर नहीं जाते, उन्हें यह विश्वास हो जाएगा कि हिंदू धर्म पत्थरों का धर्म है। उससे हम अपना सर फोड़ लें तो भी कुछ नहीं होने वाला। तब वे यह कहते हुए दूसरे धर्मों में जाने के लिए तैयार हो जाएंगे कि स्पृश्यों लोगों! लो अपना धर्म! लेकिन इस बात की संभावना नहीं है कि स्पृश्य लोग इस मसले को इस हद तक जाने देंगे लेकिन हमें अपना सत्याग्रह इतने बडे़ पैमाने पर करना चाहिए कि सरकार के जेलें भर जाएं और सत्याग्रही कैदियों के लिए जगह न बचे और स्पृश्य लोगों को यह बच्चों का

खेल न लगे वरन् उससे उन्हें झटका लगना चाहिए।

सत्याग्रह की सफलता का विचार करते समय यह जानना जितना जरूरी है कि सत्याग्रह किसके खिलाफ करना है। उतना ही इस बात के बारे में विचार करना भी जरूरी है कि सत्याग्रह किसे करना चाहिए। सत्याग्रह अपने मानवी हकों को प्राप्त करने का उपाय तो है ही। उस उपाय को फलदायी बनाने के लिए अस्पृश्य समाज के जितने भी स्त्री-पुरुष भाग लें उतना ही उसकी सफलता के लिए आवश्यक है। लेकिन हमारी नजर में सत्याग्रह केवल एक व्यावहारिक उपाय ही नहीं है तो वह एक तरह से आत्मशुद्धि करने के लिए शुरू किया गया यज्ञ है। इस यज्ञ में हर अस्पृश्य ने छलांग लगा कर अपने आप को शुद्ध कर लेना चाहिए। यह बात सही है कि स्पृश्य लोग अस्पृश्य लोगों को अशुद्ध और अपवित्र मानते हैं, लेकिन यह भी बात उतनी ही सही है कि अस्पृश्य लोग अपने आप को अशुद्ध और अपवित्र मान कर व्यवहार करते हैं। अब तक स्पृश्य लोगों का वर्चस्व होने के कारण अस्पृश्य लोगों को यह आदत पड़ गई है कि स्पृश्य जो बताएं वह करना और जिस तरह का बर्ताव करने के लिए कहें वैसा बर्ताव करना। अस्पृश्यों के मन में यह भावना भर गई है कि स्पृश्य लोग श्रेष्ठ हैं और हम छोटे हैं। वे हमारे नायक हैं और हम उनके नौकर हैं। इस कारण ही अस्पृश्यता टिकी रही है। इस भावना को जलाए बगैर आत्मसम्मान की भावना अस्पृश्य लोगों में जागृत नहीं होगी और वह जागृत हुए बिना अस्पृश्यता निवारण नहीं होगा। इस आत्मशुद्धि के लिए हर अस्पृश्य के लिए इस सत्याग्रह में भाग लेना जरूरी होने के बावजूद यह संदेह होना बिल्कुल स्वाभाविक है कि सांसारिक कामों में फंसे अस्पृश्य लोग इस सत्याग्रह में क्या प्रत्यक्ष रूप से भाग ले पाएंगे या नहीं। और अगर ऐसा हुआ, अगर बहुत कम लोगों ने इसमें भाग लिया और पर्याप्त लोगों ने सत्याग्रह में भाग नहीं लिया तो उससे खास फायदा नहीं होगा। कारण यह है