14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 90

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कि सत्याग्रह दुराग्रही लोगों को सत्य का अवलंबन करने के लिए बाध्य करने का मार्ग है। ऐसे दुराग्रही व्यक्ति को त्राहि-त्राहि करने के लिए अगर इतने बड़े पैमाने पर सत्याग्रह नहीं हुआ तो वह अपना दुराग्रह छोडे़गा नहीं। इसलिए हमारा अनुरोध है कि हमें सांसारिक कामों से मुक्त हो चुके या सांसारिक कामों में न पड़े हुए पांच हजार अस्पृश्य युवकों का एक सत्याग्रह दल तैयार करना चाहिए और इस दल के जरिए जहां-जहां सत्याग्रह करने की जरूरत पडे़ वहां-वहां सत्याग्रह किया जाए इस योजना पर अगर अमल किया गया तो सत्याग्रह की योजना में कोई कमी नहीं रहेगी। और पांच हजार लोगों के इतने बडे सत्याग्रही दल को हम भेज सकें तो सत्याग्रह की सफलता के बारे में कोई संदेह नहीं रहेगा। इस तरह के दल को तैयार करने के लिए आर्थिक मदद चाहिए। और इसके लिए कुछ समय भी लगेगा। यह होने तक अस्पृश्य लोग जिस थोड़ी बहुत संख्या में सत्याग्रह कर सकते हैं, उतनी संख्या के साथ सत्याग्रह शुरू करें।

हम जानते हैं कि कई स्पृश्य लोग अस्पृश्यों के सत्याग्रह के मार्ग में बाधक बन रहे हैं। इन स्पृश्य लोगों की दलील है कि अस्पृश्य लोगों के समान अधिकारों का मुद्दा अस्पृश्यों के सत्याग्रह से हल नहीं होगा। इस समस्या को स्पृश्यों के बीच आंदोलन कराकर हल करना चाहिए। और जिस दिन स्पृश्य लोग अपनी मर्जी से मंदिरों पर यह सूचनापट्ट लगाएं कि अस्पृश्य भी पूजा के लिए, भगवान के दर्शन के लिए आएं। उस दिन अस्पृश्यों को मंदिर में प्रवेश करना चाहिए, तब तक वे कोई जल्दी न मचाएं! लेकिन क्या स्पृश्य लोग अपनी मर्जी से इस समस्या को हल करेंगे? हमें उसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं है। क्योंकि उन लोगों का कहना है कि यह बहुमत, दया, ममता, नैतिकता या समान अधिकार का सवाल नहीं है। यह केवल धर्म के सिद्धांतों का सवाल है। अस्पृश्य इस सवर्ण रूपी विराट पुरुष का कोई भी अंग नहीं बन सकते क्योंकि ब्राह्मणमुख, क्षत्रियबाहु, वैश्य जांघों और शूद्र पांव बनने के बाद अस्पृश्य लोगों के लिए इस विराट पुरुष में कोई स्थान बचता ही नहीं। अस्पृश्य लोग इस हिंदू विराट पुरुष के पैरों की जूती हैं। जूता कभी शरीर का हिस्सा हो ही नहीं सकता। उसी तरह अस्पृश्य कभी भी हिंदू धर्म के साथ एकरस नहीं हो सकते। उनकी ऐसी इच्छा मूर्खतापूर्ण और गलत सोच है। अस्पृश्य वर्ग मुसलमान वर्ग की तरह ही परिधि के बाहर का वर्ग है। वह स्वधर्म रूपी विराट पुरुष के पांवों के परे का और शरीर से सीधे तौर पर संबंध न रखने वाला हिस्सा है। जिन लोगों के विचार इस तरह के हैं उन लोगों की नीयत पर और सदभाव पर अस्पृश्य लोग विश्वास करके चुपचाप बैठे रहें इस तरह का उपदेश छलपूर्ण न हों तो भी मूर्खतापूर्ण तो अवश्य है ही।

कुछ स्पृश्य लोग कहते हैं कि यदि अस्पृश्य लोगों ने सत्याग्रह शुरू किया तो वह सफल होना संभव नहीं है। क्योंकि उन्होंने अगर सत्याग्रह के शस्त्र का स्पृश्य लोगों