14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 91

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के खिलाफ उपयोग किया तो कुछ स्पृश्य लोगों की सहानुभूति अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम के साथ जो है वह भी वे गंवा बैठेंगे। क्योंकि यह आघात सारे स्पृश्य समाज पर होगा। और सुधारवादी और सनातनी स्पृश्य इस हमले का मुकाबला करने के लिए एकजुट हुए बिना नहीं रहेंगे। लेकिन हम इन लोगों से पूछते हैं कि हमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि स्पृश्य लोगों में से एक हिस्सा हमारे साथ है। हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आपको अगर सचमुच हमसे सहानुभूति है तो हमें, कुछ स्पृश्य लोग हमारे साथ हैं की वजह बताकर हमें सत्याग्रह से रोकें नहीं। यदि आप सचमुच हमारे साथ हैं और हमारे साथ हो रहे अन्याय को लेकर आपको गुस्सा या चिढ़ है तो आप भी हमारे सत्याग्रह में शामिल होइए। इसी में आपकी सहानुभूति की असली परीक्षा है। नहीं तो आपकी दोस्ती हो या द्वेष हमारे लिए दोनों बराबर हैं।

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”अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादराः!!“

अमेरिका में जब गुलामी की प्रथा का उन्मूलन करने की मुहिम शुरू हुई तब अमेरिका के गोरे लोगों में दो गुट, दो खेमे थे। दक्षिण के गोरे लोग इस मुहिम के खिलाफ थे तो उŸार के गोरे लोग इस मुहिम के पक्ष में थे। फिर भी उŸार के राज्यों के गोरे लोगों ने गुलामी की जंजीरों में जकडे़ हुए अश्वेत लोगों को यह ब्राह्मणी उपदेश नहीं किया कि दक्षिण के कुछ गोरे लोग तुम्हारे खिलाफ हैं, इसलिए तुम गुलामी के खिलाफ आंदोलन मत करो। इसके विपरीत अश्वेत लोगों से गठजोड़ करके उन्होंने उनके साथ सहयोग करके उनकी स्वतंत्रता का विरोध करने वाले अपने जातिबंधुओं को स्वर्ग की राह दिखाई और किसी भी तरह की कोताही नहीं की। इसी तरह स्पृश्य वर्ग के जो लोग आपकी मांग को उचित समझते हैं उन्हें अश्वेत लोगों के प्रति गोरे लोगों ने सहानुभूति दिखाते हुए जैसा व्यवहार किया वैसा अगर आप भी करके दिखाएंगे तो ही हम आप पर विश्वास रखेंगे, ऐसा बिल्कुल साफ-साफ बताया जाना चाहिए। नहीं तो ये लोग सहानुभूति के नाम पर जो अन्याय एक भी दिन बर्दाश्त नहीं करना चाहिए उस अन्याय को आगे भी स्वखुशी से बर्दाश्त करने के लिए प्रवृŸा (बाध्य) करेंगे। तीसरी श्रेणी के स्पृश्य लोग कहते हैं कि स्पृश्य और अस्पृश्य लोग एक ही समाज के अंग हैं। सत्याग्रह अपने लोगों के खिलाफ नहीं दूसरों के खिलाफ करना होता है। ऐसा न भी हो तो भी ऐसे समय जब हिंदू समाज पर बाहर से हमले हो रहे हैं अस्पृश्यों को उसके निवारण में मदद करने के बजाय आपस में वैमनस्य (विवाद) पैदा करना सही नहीं है। यह उपदेश बहुत अच्छा है! लेकिन इसे अस्पृष्य ही केवल क्यों मानें? जिस धर्म में उनके लिए कोई जगह ही नहीं है, जहां उन्हें पांव की जूती समझ कर व्यवहार किया जाता है, उस धर्म की रक्षा के लिए हम क्यों अपनी जान दें? यह जिम्मेदारी स्पृश्य लोगों की है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकारों पर उनका एकाधिकार है। ”खानेकू हम और लडनेकू तुम“ का उपदेश पागलपन है। अस्पृश्य लोग