14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 92

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इतने मूर्ख नहीं हैं कि उसे चुपचाप मान लें। उन्हें अब यह लगने लगा है कि अब तक हिंदू धर्म की रक्षा करके उन्होंने बहुत बड़ी गलती की। ऐसी मानसिकता वाले अस्पृश्य लोगों को उपरोक्त उपदेश करने का अधिकार स्पृश्य लोगों को है, ऐसा हमें नहीं लगता। विरोधी पक्ष की मजबूरी का फायदा उठा कर अपना काम निकाल लेना यह व्यावहारिक है। अपने सामाजिक अधिकारों को हासिल करने के लिए अस्पृश्य लोगों ने स्पृश्य लोगों के प्रति यही नीति अपनाई है। यह नैतिकता की दृष्टि से उचित ही नहीं होगा। मगर राजनीतिक अधिकार हासिल करने के लिए युद्ध के समय सरकार के रास्ते में रोडे अटकाने वाले स्पृश्य लोगों को हमारी आलोचना करने का अधिकार कैसे हासिल हो सकता है? जो लोग यह कहते हैं कि आपस में झगड़ा न करें, उन्हें हमारा सुझाव है कि तुम्हारी गीता क्या कहती है यह देखो। गीता में भगवान ने अर्जुन को जो उपदेश दिया है उसमें इससे अलग क्या कहा है? कौरव -पांडवों की सेनाएं जब लड़ाई के लिए तैयार होकर कुरुक्षेत्र में खड़ी थीं, तब अर्जुन ने युद्ध करने से पहले अपना रथ बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया और दोनों सेनाओं की तरफ नजर दौड़ाई और देखा कि कौरवों की सेना में भी अपने ही स्नेही, नजदीकी और गुरु हैं। तो उसे दिखाई दिया कि युद्ध का स्वरूप क्या है? तो उसने युद्ध करने से इनकार कर दिया और अपने हाथों में लिए धनुष-बाण को नीचे रख कर वह बैठ गया। ऐसा नहीं कि श्रीकृष्ण नहीं जानते थे कि कौरव और पांडव एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। हालांकि कौरव, पांडवों का हक देने के लिए तैयार नहीं थे, तो भी भीष्म, द्रोण, विदुर आदि लोग उनके अनुकूल थे। और श्रीकृष्ण जानते थे कि कुछ समय बाद उनके विचारों का परिणाम कौरवों पर हो सकता था। आपस में झगडे़ न करें यह सिद्धांत अगर सत्य होता तो अर्जुन के व्यवहार को देख कर भगवान कृष्ण ने यह क्यों नहीं कहा कि तुम जो कह रहे हो वही सही है, तुम्हें जो अनुभूति हुई उसे देख कर मुझे

खुशी हो रही है? इसके विपरीत उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम्हें यह दुर्बुद्धि कैसे हुई? यह कायरता तुम्हें शोभा नहीं देती। इस दुर्बलता को छोड़कर युद्ध के लिए उठ कर

खडे़ हो जाओ। इतना ही नहीं, यह देखकर भी कि इस युद्ध में अनगिनत लोग मारे जाएंगे, उन्होंने इस बात को कौड़ी का भी महत्व नहीं दिया। और यह सब इसलिए हुआ, कौरवों द्वारा पांडवों के छीने गए राज्य को पाने के लिए! जिस उद्देश्य के लिए अर्जुन सत्याग्रह कर रहा था, वह उद्देश्य और जिस उद्देश्य के लिए अस्पृश्य सत्याग्रह करने वाले हैं उस उद्देश्य की तुलना एकदम महत्त्वहीन है। पांडव राज्य के लिए लड़ रहे थे, अस्पृष्य लोग मानवीयता के लिए लड़ रहे हैं। मानवीयता जाने पर इन्सान का सब कुछ चला जाता है, लेकिन राज्य के जाने से मानवीयता तो बाकी रहती है। राज्य के बगैर पांडव कोई मर नहीं जात,े लेकिन मानवीयता के बगैर अस्पृश्य लोग जीते जी मरे (मुर्दे) की तरह हैं। यदि राज्य जैसे शूद्र उद्देश्य के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को गुरुहत्या, बंधुहत्या और कुलक्षय जैसे घृणित कर्म करने के लिए प्रेरित करें, तो मानवीयता की रक्षा