14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 93

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के अति उŸाम या श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए अस्पृश्य सामान्य सा हठयोग भी न करें ऐसा स्पृश्यों का जो कहना है यह फिजूल है।

असल में इन स्पृश्यों की बातें सुनने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वे हमारे कितने भी हितचिंतक हों वे हमें इस बारे में उपदेश करने के लिए अपात्र हैं क्योंकि यह सवाल अधिकारों का, जाति का, स्वार्थ का व मानसिकता का है, विद्या, ज्ञान और बुद्धि का नहीं है। इसलिए उनके स्वार्थपूर्ण उपदेश को न सुन कर उनसे साफ कहना चाहिए कि आप हमें उपदेश देने के चक्कर में न पडें़। कोई भी किसी भी युद्ध से पहले राजनयिक बातचीत होती है, उसका कोई उपयोग न होने पर फिर युद्ध की नौबत आती है। मुझे लगता है कि अस्पृश्यता उन्मूलन के काम पर काफी समय तक बातचीत हो चुकी है। जबसे अस्पृश्यता ने हिंदू धर्म में प्रवेश किया तबसे अनेक महात्माओं ने उसके खिलाफ कोशिश की, लेकिन इस बारे में स्पृश्य लोगों का दुराग्रह इतना भयंकर है कि अपरिहार्य प्रसंगों को छोड़ दें तो उन्होंने इस मामले में सुई की नोक पर जितनी मिट्टी आती है उतनी मिट्टी भी पांडवों को नहीं देंगे, ऐसा कहने वाले पाषाणहृदयी और अधर्मी दुर्योधन से कुछ ज्यादा उदारता दिखाई है ऐसा कोई नहीं मानेगा। और ऐसा लगता भी नहीं कि आगे उनकी प्रवृŸा में आत्मप्रेरणा से अस्पृश्यों के लिए कोई अनुकूल परिवर्तन होगा। असल में देखा जाए तो हमने इस अन्याय को स्वीकार किया इसलिए वह आज तक चलता रहा। हमने अगर उसे ठुकराने का मनःपूर्वक निश्चय किया तो कोई भी उसे हम पर लाद नहीं सकता। जिस ब्राह्मण धर्म ने हमें हीन बना दिया, उस ब्राह्मणी धर्म ने कायस्थों की जाति पर भी हीनता की मुहर लगाने की कई बार कोशिश की, लेकिन उस जाति के लोगों ने समय पर ही प्रयत्न करके अपना दर्जा बरकरार रखा। काल का चक्का जब उलटा घूम रहा था तब भी हमारे पूर्वज गहरी नींदे में सोते रहे। अन्य लोगों की तरह हमारे लोगों ने भी आंखें खुली रख कर अन्याय का प्रतिकार किया होता तो आज अस्पृश्य यह केवल इतिहास का शब्द भर रह जाता। पिछड़ी पीढ़ी में ऐसा करने का निश्चय नहीं किया, यह अत्यंत निंदनीय लेकिन पिछली पीढ़ी में ज्ञान का प्रसार न होने के कारण उनके बेपरवाही के बर्ताव को क्षम्य कहा जा सकता है। मगर इस पीढ़ी की बात अलग है। इस पीढ़ी को वह ज्ञान प्राप्त हुआ है जो अस्पृश्यों को कभी प्राप्त नहीं हुआ और इसलिए पिछली पीढ़ी के हाथ से जो काम नहीं हुए, वे काम करना इस पीढ़ी का कर्त्तव्य है। अगर इस पीढ़ी ने इस कर्त्तव्य को पूरा नहीं किया तो यही कहना पड़ेगा कि वह कुलदीपक नहीं कुलंगार है।“

अध्यक्ष के भाषण के बाद विषय निर्धारण समिति के चुनाव हुए और सभा का काम दूसरे दिन के आठ बजे तक के लिए स्थगित किया गया।