14. अस्पृश्यता और सत्याग्रह की सफलता - नवंबर 1927 अमरावती - Page 95

78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पत्र पर विचार करने के बाद और यह विश्वास करके कि नामदार खापर्डे

इस बारे में कोशिश करने वाले हैं इस काम के लिए उन्हें समय देने के

लिए 15 तारीख को होने वाले सत्याग्रह की तारीख को आगे बढ़ाने में

कोई हर्ज नहीं है।

(ब) फिर भी सत्याग्रह की तारीख किसी भी कारण से 15 नवंबर से 3 महीने

से ज्यादा टाली न जाए।

(क) इस सभा का सत्याग्रह समिति से कहना है कि समझौते की बातचीत

में ऐसी किसी शर्त को न माना जाए, जिसमें अस्पृश्यों के मंदिर में अंतिम

सीमा तक जाने के पूरे अधिकार में किसी तरह की बाधा आए।

(ड) इस समिति का सत्याग्रह कमेटी से यह कहना है कि भविष्य में जो

सत्याग्रह किया जाना है, वह जहां तक संभव हो सामुदायिक ढंग से, पद्ध

ति से किया जाए।

उपरोक्त सभी प्रस्तावों पर कई वक्ताओं के पक्ष और विपक्ष में भाषण के बाद सभी प्रस्ताव भारी बहुमत से पास किए गए। अंत में, श्री गवई, नाईक, और अमृतकर ने उचित शब्दों में अध्यक्ष और मेहमान लोगों के प्रति आभार प्रकट किए और शाहू छत्रपति के जयकारे के बीच सभा के कामकाज का समापन हुआ।

दोपहर में ”महाराष्ट्र केसरी“ के संपादक श्री चव्हाण व श्री के. बी. देशमुख के यहां डॉ. अम्बेडकर व मेहमान लोगों को टी-पार्टी दी गई।

जब डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अमरावती के सम्मेलन में थे उन्हें उनके बडे़ भाई बालाराम का रविवार, 1 नवंबर, 1927 को दोपहर 12 बजे अचानक हृदयगति रुक जाने से निधन होने का समाचार मिला इस कारण वे अंतिमयात्रा में शामिल नहीं हो सके। उनकी अनुपस्थिति में जो अस्पृश्य बंधु शवयात्रा में उपस्थित थे, उनके प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने ”बहिष्कृत भारत“ के 25 नवंबर, 1927 के अंक में कहा कि,

”मेरे बडे़ भाई के निधन के समय मैं बंबई में नहीं था। अंबादेवी के सत्याग्रह के लिए अमरावती में 13 नवंबर, 1927 को मेरी अध्यक्षता में जो सम्मेलन होने का तय हुआ था, उस सम्मेलन में मैं गया था। मेरी अनुपस्थिति में जिन तीन-चार हजार अस्पृश्य भाइयों ने शवयात्रा में उपस्थित रह कर अपनी पूर्ण सहानुभूति दिखाई, उन सबका मैं अत्यंत ऋणी हू।“ - बाबासाहेब अम्बेडकर