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पूर्व सूचना के अनुरूप 26 और 27 नवंबर, 1927 शनिवार-रविवार को सोलापुर जिला वतनदार महार परिषद का दूसरा अधिवेशन सोलापुर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। इसमें सोलापुर जिले के हर गांव के प्रतिनिधि आए थे। शनिवार 26 तारीख के पांच बजे से ही लोगों की अपार भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। सबकी नजरें डॉ. अम्बेडकर के आने के रास्ते पर लगी हुई थीं। ठीक सात बजे डॉ. अम्बेडकर साहब अपने परिवार के लोगों के साथ सभामंडप में प्रविष्ट हुए। उनके आने के साथ सभी लोगों ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत किया। फिर बच्चों द्वारा ईश स्तुति पर गीत गाए जाने के बाद परिषद के स्वागत अध्यक्ष जिवप्पा ऐदाले ने परिषद के कामकाज की शुरूआत करते हुए स्वागत भाषण दिया।
इसके बाद डॉ. अम्बेडकर का विचारोŸोजक भाषण हुआ। डॉ. अम्बेडकर के भाषण के दौरान सभी लोग शांत ध्यानमग्न होकर चित्र के समान तटस्थ होकर भाषण सुन रहे थे। उनका भाषण सरल मगर मर्मभेदी और प्रभावकारी था। उन्होंने कहा -
सज्जनों,
इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि पिछले महीने, 19 और 20 मार्च को महाड़ में अस्पृश्य वर्ग का जो सम्मेलन हुआ था, उस सम्मेलन में अपने सार्वजनिक अधिकारों के निर्वहन के लिए महाड के चवदार तालाब पर जाकर पानी भरने का जो उपक्रम हुआ उसके कारण वह सम्मेलन अस्पृश्योन्नति के इतिहास में चिर स्मरणीय हो गया है। वहां के स्पृश्य लोगों ने प्रतिकार करके यह दुराग्रह किया कि चवदार तालाब जैसे सार्वजनिक तालाब से अस्पृश्यों को पानी नहीं भरने देंगे। उसी समय सम्मेलन के संचालकों ने घोषणा की कि महाड़ को वे पानीपत का युद्ध समझते हैं और उसे जीते बगैर वे आराम से नहीं बैठेंगे। इतना ही नहीं तो जरूरत पड़ने पर सत्याग्रह करके अपनी कही बातों को सही साबित करने की प्रतिज्ञा की।
यह खबर प्रकाशित होने के बाद स्पृश्य लोग अस्पृश्यों को उपदेश देने लगे। महाड़ की घटना होने के बाद जिन्हें भले कुछ भी न समझ में आता हो मगर जिन्हें दंभ है कि उन्हें, ”हिन्दुस्तान की आबो हवा के बारे में पता है“, ऐसे चित्राव शास्त्री ने बहुत गंभीर शब्दों में कहा कि ”ऐसे आंदोलन करते समय स्पृश्य और अस्पृश्यों
* संदर्भ : ‘‘बहिष्कृत भारत’’, 23 दिसम्बर, 1927