15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 97

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की आबादी के फर्क को ध्यान में रखा जाना चाहिए। हमारे मराठी इलाके में तीन चौथाई स्पृश्य और एक चौथाई अस्पृश्य हैं। स्पृश्यों में कितने ही आपसी मतभेद और अंतर्विरोध क्यों न हों लेकिन अस्पृश्यता के बारे में सभी के विचार समान हैं। इसकी प्रतीति महाड आदि स्थानों में रोजाना होती है और अस्पृश्यों की रोजी-रोटी पूरी तरह से ऐसी मनोवृŸा वाले स्पृश्यों के हाथ में है। इसमें संदेह नहीं कि जिस दिन अस्पृश्यों की रोजी-रोटी स्वतंत्र हो जाएगी और जिस दिन वे अपने मानवीय अधिकारों के लिए अपनी जान भी कुर्बान करने को तैयार हो जाएंगे, वह दिन केवल अस्पृश्य ही नहीं हिन्दू और हिन्दुस्तान की दृष्टि से कुछ अलग ही होगा।“ एक हाथ से हिन्दू संगठन का कार्य करने वाले और दूसरे हाथ से अपनी जातीय श्रेष्ठता के लिए संघर्ष करने वाले मुंबई के एक साप्ताहिक के पत्रकार ने भी ऐसा ही बेसुरा राग अलापा। ये संपादक महाशय कहते हैं कि, ”सत्याग्रह शब्द कानों को बहुत मीठा लगता है। लेकिन यह भी सही है कि सत्याग्रह एक दुधारी तलवार है। सत्याग्रह के बल पर कल डॉ. अम्बेडकर अपने अनुयायियों के साथ महाड़ के तालाब का पानी पी लेंगे, लेकिन उनकी इस क्रिया की प्रतिक्रिया जब गांव-गांव में होने लगेगी, तब बेचारे अस्पृश्यों की खाई से निकलकर कुंए में गिरने की स्थिति होगी तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा ? क्या डाक्टर अम्बेडकर यह मानते हैं कि दो स्थानों पर सत्याग्रह सफल हो जाने से सारे भारत में अस्पृश्यता नष्ट हो जाएगी ? हमारा तो स्पष्ट मत है कि डॉ. अम्बेडकर के सत्याग्रह की परिणिति भयंकर सामाजिक कलह और शायद रक्तपात में होगी।“

जिस तरह इस प्रांत के लोग महाड़ के सत्याग्रह के बारे में अस्पृश्य लोगों को धोखे की सूचना दे रहे हैं उसी तरह वर्हाड प्रांत के लोगों को अमरावती के अंबादेवी के मंदिर में जाने के लिए सत्याग्रह करने के लिए तैयार अस्पृश्यों को भी चेतावनी दी जा रही है। ऐसा पुणे से प्रकाशित होने वाले ”स्वराज्य“ अखबार से पता चलता है। अमरावती के श्री हनुमान व्यायाम शाला के मैदान में स्पृश्य लोगों की एक आम सभा अक्तूबर में हुई थी। उसमें अस्पृश्य लोगों को स्पृश्यों द्वारा धमकी दी गई कि तुम गरीब और परजीवी हो, यदि तुमने स्पृश्य हिन्दुओं का मन दुखाया और धमकियां देकर समस्या को हल करने की कोशिश की तो स्पृश्य लोग तुम्हें भूखों मार कर तुम्हारा दिमाग ठीक कर देंगे।

संपिŸा ही राष्ट्र की समृद्धी के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इस दृष्टि से उसका संग्रह बेहद जरूरी है। संपिŸा का उपयोग गरीब जनता को जकड़ कर रखने या उसकी प्रगति को कुंठित करने और अपना वर्चस्व कायम करने के लिए जब अमीर लोग उसका उपयोग करते हैं, तो शास्त्रकारों ने ऐसी संपिŸा को आसुरी संपिŸा कहा है और उसका धिक्कार किया है। धर्मशास्त्र की यह सीख उन लोगों