15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 98

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को भी स्वीकार्य है जो हमें उपदेश दे रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो ये लोग जब मुंबई जैसे शहर में मालिक और मजदूरों की लड़ाई उग्ररूप ले लेती है, तब हड़ताल करने वाले मजदूरों को यह उपदेश देते कि सावधान रहो, मालिक तुम्हारा बहिष्कार करेंगे, तुम्हारे रोजगार के साधन उनके हाथों में हैं। इसका हमें कुछ भी बुरा नहीं लगता वरना हम उनका अभिनंदन ही करते हैं। लेकिन हम उनसे एक सवाल पूछना चाहते हैं वो यह कि यदि आर्थिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के खिलाफ संपत्ति का दुरुपयोग करना अधर्म है तो सामाजिक समानता के लिए संघर्ष करनेवाले अस्पृष्य लोगों के खिलाफ संपिŸा का दुरुपयोग करना क्या धर्म है? और यदि वह अधर्म है तो जिन लोगों ने सत्याग्रह के बारे में उपदेश करना शुरू किया है, उन्होंने हमारे विरोधियों से यह क्यों नहीं कहा कि संपिŸा के बल पर हमारा बायकाट करना और प्रगति को अवरुद्ध करना पाप है। यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो हमें उनके मन की निर्मलता का विश्वास होता। उनके ऐसा न करने के कारण हमें इस बात पर यकीन नहीं होता कि उन्होंने उपदेश केवल अस्पृश्यों को सावधान करने के लिए किया है। हम ऐसा मानते हैं कि उसमें धमकी का जहर भरा हुआ है। कारण यह है कि कई लोगों को खुला विरोध करने में शर्म महसूस होती है, तो वे उपदेश की आड़ लेकर विरोध करने की इच्छा को पूरा कर लेते हैं, यह वैसी ही बात है। हमें लगता है कि यह केवल उपदेश नहीं है उससे आगे बढ़कर जिन स्पृश्य लोगों के खिलाफ यह सत्याग्रह किया जा रहा है, उन लोगों को यह याद दिलाने की कोशिश है कि अति उत्साही अस्पृश्यों का दिमाग ठिकाने लाने के लिए उनके पास कौन-सा हथियार है? क्योंकि जिन लोगों की इस मुद्दे के साथ सच्ची सहानुभूति है और जिन्हें अच्छी तरह पता है कि स्पृश्य लोग आश्रय देना बंद करके अस्पृश्यों को सत्याग्रह से परावृŸा करेंगे। उन्होंने जिस तरह अस्पृश्यों को संकेत दिया कि स्पृश्यों के हाथों में कौन सा हथियार है, उसी तरह उन्हें स्पृश्यों को भी यह चेतावनी देनी चाहिए थी कि सत्याग्रह जैसे सत्कार्य को नाकाम करने के लिए अपने हथियार का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। लेकिन यह उन्हें नहीं सूझा। दरअसल सत्याग्रह के जवाब में बहिष्कार किया जाएगा, यह अस्पृश्यों को बताने की कोई जरूरत नहीं है। जिन अस्पृश्यों ने सत्याग्रह का आंदोलन शुरू किया उन्हें पहले से ही भविष्य की कल्पना थी। लेकिन इस बहिष्कार से कौन डरने वाला है ? जिसके सामने लक्ष्य नहीं होगा वही डरेगा। जिनकी आंखों के सामने स्पष्ट लक्ष्य है, वह कदापि नहीं डरेगा। ध्योयवादी आदमी यह जानता है कि कोई ध्येय कितना भी आसान क्यों न हो, उसे हासिल करने के लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है। जो लक्ष्य जितना ऊंचा होता है, उसे पाने के लिए उतनी ही दृढ़ मेहनत चाहिए होती है। इतिहास में मेहनत के बगैर किसी के द्वारा अपने उद्देश्य को प्राप्त करने का कोई प्रमाण नहीं है। केवल सुख और स्वास्थ्य हासिल करना मनुष्य का उद्देश्य नहीं है। अगर ऐसा होता