117 12.2.1938 चातुर्वर्ण्य के कारण हिन्दुस्तान की अवनति और पतन हुआ है - सटाणा - Page 100

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काबीज हो सकते हैं। लेकिन उनकी हालत उन कुत्तों जैसी हुई है जो भरपूर भोजन के बाद कूड़ेदान में फेंके गए पत्तलों को चाटने में ही खुश रहते हैं। जो थोड़ा-बहुत कुछ उनके हिस्से आता है उसी में वे खुश लगते हैं। मैं ऐसा नहीं होने देना चाहता। राजनीति में समानता पैदा होनी चाहिए। इतना ही नहीं, कोई लायक भील हो तो उसे भी मुख्यमंत्री बनना चाहिए। समाज में ऊंच-नीच का जो भेद व्याप्त है वह कम होना चाहिए। यह बात काँग्रेस से होना संभव नहीं। इसीलिए मैं काँग्रेस में शामिल नहीं होता।

कई बार यह बताया जाता है कि महात्मा गांधी से सामना होते ही विरोधक अपना विरोध भूल जाते हैं। उन्हें डर लगता है ऐसा कहा जाता है। लेकिन मेरा अनुभव इसके ठीक विपरीत है। मैं दस बार महात्मा गांधी से मिला हूं लेकिन जैसे कहा जाता है उस तरह की कोई पिचाश बाधा मुझे नहीं हुई है।

गरीब, किसान और मजदूर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए हमने स्वतंत्र लेबर पार्टी बनाई है। इस पक्ष के बारे में बहुत विस्तार से बताने के बजाय संक्षेप में ही बताता हूं। कई लोग मुझसे पूछते हैं कि राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए आज जब काँग्रेस है तो दूसरा पक्ष बनाने की क्या जरूरत है? मैं उनसे बस इतना ही कहना चाहता हूं कि काँग्रेस पूंजीपतियों की दासी है। क्योंकि काँग्रेस में शामिल पूंजीपति ही भरपूर रुपए लुटा कर आज काँग्रेस के सभी चोंचले पूरे कर रहे हैं। ऐसा करने के पीछे पूंजीपतियों का केवल एक ही उद्देश्य है कि काँग्रेस के जरिए अपना अधिक से अधिक हित साधा जाए। वैसे, काँग्रेस वाले ऊपरी तौर पर कहते हैं कि हम गरीब किसानों के लिए और मजदूरों के लिए ही स्वराज की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन ऐसा कहना उनका दोमुंहाप ही है। क्योंकि अमीर पूंजीपति और गरीब किसान और मजदूरों के हितसंबंध परस्पर विरोधी हैं। सौ गरीबों के लिए अमीर पूंजीपति अपना पैसा खर्च कर अपना ही नुकसान कराएंगे यह संभवनीय नहीं लगता। बिल्ली-चूहा, सांप और नेवला भेड़ और भेडि़या में जैसे पैदाइशी बैर होता है उसीप्रकार पूंजीपति और गरीब, किसानों का भी है। जिस प्रकार नेवले को कभी प्यार से सांप को चाटता हुआ, चूहे को बिल्ली का दूध पीते हुए या भेड़ को भेडि़ए की गोद में सिरे टिका कर सोया हुआ आमतौर पर देखने में नहीं आता उसी प्रकार अमीर पूंजीपतियों की मुहब्बत से गरीब, किसान और मजदूरों का हित होगा इस बात पर भी भरोसा कर कोई धोखा ना खाए। यह सब गांधी की माया है और इसीलिए किसान और मजदूरों को पूंजीपतियों की संस्था काँग्रेस से सावधान रहना चाहिए। मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं। क्योंकि गरीब और किसानों को और मजदूरों को छूट कर जो मारवाड़ी अमीर बनता है वह सालाना चार आने का चंदा देकर काँग्रेस का सदस्य बनने के बाद अपना स्वभाव-धर्म सहसा बदल लेगा यह संभव दिखाई नहीं देता। यह हास्यास्पद है। आज हरिपुरा में काँग्रेस का 51वां अधिवेशन होने जा रहा है। कहते हैं कि