118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 113

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और पीडि़त व्यक्ति हैं? क्या वे समान वंशीय, एक ही देश के निवासी, समान भूत-वर्तमान वाले हैं और क्या उनका भविष्य भी समान ही रहने वाला है? तो उन्हें संगठित होना चाहिए। मार्क्स के जमाने से यह उपदेश भाषणों में दिया जाता रहा है। तो क्या जर्मनी के वंचित और फ्रांस के शोषित किसान एकजुट हुए? 100 साल बीत जाने के बाद भी वे एकजुट होना सीख नहीं पाए। पिछले महायुद्ध में वे खुले आम एक-दूसरे से निर्दयी दुश्मनों की तरह लड़े। भारत के बारे में यह ख्याल साफ गलत है। भारत में इस तरह सापेक्ष रूप से दो निश्चित वर्ग नहीं हैं। सभी कामगार एक हैं और उनका वर्ग एक है यह नारा आदर्श है और उसे प्रत्यक्ष जीवन में लाना है इसलिए उसी को वास्तविकता मान कर चलना बहुत बड़ी भूल है। कामगारों की सेना को अधिक बलशाली कैसे बनाया जाए? कामगारों के बीच एकता कैसे स्थापित की जा सकती है? एक गुट द्वारा दूसरे गुट के साथ अन्याय बरत कर हरगिज नहीं। जिनके साथ अन्याय हुआ है उनके लिए अड़चनें पैदा करके भी नहीं। जिनके साथ अन्याय हुआ वे अगर आंदोलन करना चाहते हों तो रूकावटें पैदा करके भी नहीं। वंश और धर्म के कारण एक कामगार अगर दूसरे कामगार का दुश्मन बन रहा हो तो उनकी एकता में बाधा उत्पन्न करने वाले ये कारण नष्ट करना ही कामगारों की एकता का सही रास्ता है। एक कामगार दूसरे कामगार को जो अधिकार नहीं दे सकता उसकी मांग वह खुद के लिए भी नहीं कर पाएगा यह कामगारों को बताना ही उनकी एकता का उपाय है। ऊच-नीच का भेदभाव मानना और उसका पालन करना यह सिद्धांततः गलत है और कामगार संगठन के लिए घातक है। यह बात कामगारों को बताना ही कामगार एकता का सही मार्ग है। दूसरे शब्दों में कहना हो तो हमें कामगारों के मन से ब्राह्मणवादी-असमानता के ख्यालों को मिटाना होगा। हालांकि कामगारों में इस प्रकार का उत्साह निर्माण करने वाले कामगार नेता कहां हैं? कामगार नेताओं को पूंजीवाद के खिलाफ जोर-जोर से भाषण देते हुए मैंने सुना है। लेकिन मैंने किसी कामगारों के नेता को कामगारों के बीच की ब्राह्मणवादी असमानता के बारे में बोलते हुए नहीं सुना है। उलटे इस मसले पर उनका मौन अधिक मुखर है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे-ब्राह्मणवाद में उनकी श्रद्धा होना, कामगारों की एकजुटता से उन्हें कुछ लेना-देना न होना, ब्राह्मणवाद का कामगारों के बीच की फूट से कुछ संबंध है ऐसा उन्हें न लगना आदि कारणों से उनके मौन का कुछ संबंध हो या ना हो, केवल नेता बने रहने में उनकी दिलचस्पी होने के कारण कामगारों की भावनाओं को ठेस न लगे इसलिए मौन उनके द्वारा धारण किया गया हो- इसकी छानबीन करने के लिए मैं अपना समय बिताना नहीं चाहता। हालांकि मुझे यह बताना ही पड़ेगा कि ब्राह्मणवाद अगर कामगारों की आपसी फूट की बुनियादी वजह हो तो कामगारों के मन से उसे हटाने के लिए जोरदार कोशिशें होनी चाहिए। ध्यान न देने भर से यह छूत का रोग मिटने वाला नहीं है। या उसके बारे में मौन रहने से भी वह खत्म नहीं होने वाला। उसके पीछे पड़ कर, उसकी जड़ें खोद कर ही उसे

खत्म किया जा सकता है। तभी कामगारों की एकता की राह खुलेगी।