118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 114

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ब्राह्मणवाद जब तक अपनी जीवंतता के साथ प्रचलन में हैं और खेल जब तक अपने अधिकार के स्वार्थ के कारण उससे जुड़े हैं, औरों पर उसके कारण बंधन लादते हैं तब तक मुझे डर है कि इससे पीडि़तों को उसके खिलाफ संगठित होना ही पड़ेगा। वे इस प्रकार अगर संगठित होते भी हैं तो उसमें नुकसान क्या है? इस प्रकार एकजुट होने पर अगर मालिकों का नियंत्रण होता तो इस संगठन के खिलाफ हो-हल्ला मचाया जा रहा है उसमें कुछ दम है ऐसा मुझे लगता। अगर यह साबित किया जाता कि हम मालिकों के हाथ का खिलौना हैं, या हम उनकी मर्जी के हिसाब से चल रहे हैं या कामगारों में फूट डालने के लिए हम जान-बूझ कर यह संगठन खड़ा कर रहे हैं तो इस परिषद की बुराई न्यायपूर्ण मानी भी जा सकती थी। इस प्रकार का बर्ताव निश्चित रूप से विश्वासघात कहलाता। लेकिन हमारे इस आंदोलन पर मालिकों का नियंत्रण है, यह संगठन मालिकों की मदद के लिए बना है, कामगारों के हितों का नाश करने के लिए उसका निर्माण किया गया है- क्या कोई ऐसा कह सकता है? अगर कोई उसके जवाब में हां कहे तो मैं उसे चुनौती देता हूं कि वह इस बात को साबित करे।

इसलिए, इस परिषद के आयोजन के लिए शर्मिंदा होने की या किसी से माफी मांगने की जरूरत नहीं है। हमारा उद्देश्य और उसके पीछे जो कारण हैं वे काफी न्यायपूर्ण हैं। दलित वर्ग के भी एक-दो लोग हैं जिन्हें यह संगठन पसंद नहीं है। लेकिन उसमें नया कुछ भी नहीं है। उनमें से कुछ लोग औरों के हाथ के खिलौने हैं। पैसे खिलाकर उन्हें हमारे खिलाफ खड़ा किया गया है। कुछ लोगों को पथभ्रष्ट किया गया है। दलित वर्ग दुर्बल है, ‘कामगारों की एकता’ यह शब्द प्रयोग ही इतना अधिक आकर्षक है और किसी प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व वाले नेता के मुंह से हमारे लोग जब इस शब्द प्रयोग को सुनते हैं तो वे प्रभावित भी होते हैं तो उसमें अनहोनी कुछ नहीं। लेकिन लोग एक बात भूल जाते हैं कि जिन गुटों में हर मामले में इतनी परस्पर विरोधी भावनाएं और मानसिकताएं हैं, और जहां एक गुट दूसरे गुट के हित का विरोध करने वाले अधिकारों और हकों का अपने लिए दावा कर रहे हैं वहां कामगारों में असली एकता हो ही नहीं सकती। ऐसी जगह एकता का जो दावा किया जाता है वह दुर्बल और शोषित लोगों को झांसा देने के लिए किया गया बस एकता का ढोंग होता है, केवल दिखावा होता है। ऐसे ही झूठे लोगों द्वारा इस परिषद को फूट डालने वाली बताया जा रहा है। ये फूट होगी भी तो ऐसी है कि जहां असली विरोध और मतभेद हैं। यह विरोध पैदा होने का कारण सादा-सा है कामगारों का एक गुट दूसरे गुट के दलित कामगारों के विरोध में यह दावा कर रहा है कि उसे विशेष अधिकार प्राप्त हैं। इनमें से किसी भी गुट का मतभेद पैदा करने में दिचचस्पी या खुशी नहीं होती। हम बस इतना भर कर रहे हैं कि शुरू से मौजूद फूट को उजागर करने की कोशिश करते हुए अन्याय पर रोक लगाते हुए इस फूट को नेस्तनाबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।