94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपने पर होने वाले अन्याय रोकने हों तो आपको संगठन खड़ा ना करने की सलाह यहां कैसे मानी जा सकती है? अगला सवाल होगा कि आपके संगठन का उद्देश्य क्या होगा? जाहिर है कि अपने व्यवसाय के उद्देश्य से आपको संगठन खड़ा करना होगा। बिना बताए ही यह बात समझ आती है। लेकिन सवाल यह है कि नया संगठन बनाए या कि पहले से कार्यरत किसी संगठन में शामिल होना चाहिए? संगठन बनाने की कार्रवाई शुरू करने से पहले ही आपको इस बारे में सोचना होगा।
भारत में जो कामगार संगठन है वह फिलहाल बुरी हालत में है। कामगार संगठन का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह से नजरंदाज हो चुका है। कामगार संगठनों का मुख्य उद्देश्य है कामगार के जीवन-स्तर को गिरने से बचाना। जन्म से और प्रशिक्षण से अहसास होने के कारण यूरोप का हर व्यक्ति अपने जीवन-स्तर को संतोषजनक हालत में रखने की हर वक्त कोशिश करता रहता है। उस स्तर में गिरावट लाने की कितनी भी पुरजोर कोशिश क्यों न हो, वह उसका प्रतिकार करता है। भारतीय कामगारों में ऐसा दृढ़ निश्चय कहीं दिखाई नहीं देता। सब लोग यह बात जानते हैं। वह केवल जिंदा रहने की कोशिशों में ही खटता रहता है। मिल के कथनानुसार, ‘‘जहँ निकृष्टता की ओर से जाने वाली कोशिशों को डट कर प्रतिकार करने की तथा संतोषजनक जीवन-स्तर को बनाए रखने की मानसिकता का अभाव होता है वहाँ बड़े और उन्नत राष्ट्रों में भी गरीब लोगों की स्थिति केवल जिंदा रहने तक ही सीमित हो जाती है।’’ मेरी राय में भारत ऐसा राष्ट्र है जहाँ कामगारों के संगठन की नितांत आवश्यकता है। लेकिन, जैसा कि मैंने कहा भी है, आज के भारतीय कामगार संगठन सड़ांध भरे रुके हुए पानी की हालत में हैं। इसकी वजह है डरपोक, स्वार्थी तथा पथ-भ्रष्ट, कामगार नेतृत्व। उनमें से कुछ नेता ऐसे भी हैं जे केवल आरामकुर्सी पर लेटे दार्शनिक हैं। कुछ ऐसे भी जो अखबारों में अपना वक्तव्य छपा कर ही धन्य हो जाते हैं। कामगारों को संगठित करना, उन्हें शिक्षित करना और संघर्ष में उनकी मदद करना उनके कर्त्तव्य का हिस्सा नहीं है। वे केवल कामगारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए तथा उनकी ओर से बोलने के लिए चिंता से परिपूर्ण और आतुर हैं लेकिन कामगारों से प्रत्यक्ष संपर्क नहीं रखना चाहते। एक और तरह के कामगार नेता होते हैं जो केवल इसलिए कामगारों की संस्थान की स्थापना करना चाहते हैं कि उन्हें उसमें अध्यक्ष, सचिव या तत्सम कोई पद मिले। अपने पदों की रक्षा करने के लिए वे हमेशा अपनी संस्था को अलग एवं परस्पर विरोधी रखने की कोशिशों में लगे रहते हैं। कई बार तो ऐसे शर्मिंदा और अचंभित कर देने वाले वाक्ये देखने को मिलते हैं कि इन विभिन्न संस्थाओं की लड़ाई कामगार और मालिकों के बीच की लड़ाई से घोर होती है। और ऐसा केवल इसलिए क्योंकि कुछ लोगों को कामगारों के नेता के रूप में अपने आप को प्रदर्शित करने के तथा कामगारों पर अपनी हुकूमत चलाने के अपने शौक को पूरा करने के लिए। तीसरे प्रकार का नेतृत्व कम्युनिज्म के तत्वों में विश्वास करने वालों का है। हो सकता है उनका उद्देश्य भला हो लेकिन उनक मार्ग अटपटा है। यह कहने में