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मुझे बिल्कुल हिचकिचाहट नहीं है कि इन लोगों ने कामगारों का जितना नुकसान किया है उतना किसी और ने नहीं किया है। आज अगर कामगार संगठनों की रीढ़ पूरी तरह टूटी है, आज अगर मालिकों की चलती है, आज अगर कामगार संगठन शापित वास्तु बनी है तो उसकी एकमात्र वजह यह है कि किसी समय कामगार संगठनों पर किसी समय कम्युनिस्टों ने कब्जा किया था और उन्होंने उसका पूरी तरह गलत इस्तेमाल किया यही है। कामगारों में किसी तरह का असंतोष नहीं है ऐसा मान कर उसे निर्माण करना ही शायद उनका एकमात्र उद्देश्य रहा हो। क्योंकि उन्हें विश्वास है कि असंतुष्ट कामगारों के संगठन के जरिए क्रांति लाई जा सकती है और कामगारों के राज्य की स्थापना की जा सकती है। इसीलिए उन्होंने कामगारों के बीच असंतोष फैला कर उनका संगठन बांधने की मुहिम ही उन्होंने छेड़ रखी है। क्रांति सफल होने के लिए केवल असंतोष काफी नहीं होता। उसके लिए जरूरत होती है- न्यायपूर्णता की जरूरत की तथा सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के बारे में गंभीरतापूर्ण और परिपूर्ण अहसास की। क्रांतिकारी माकि्र्सस्ट भी हड़ताल की जितनी पूजा नहीं करते उतनी सिंडिक्योलिस्ट यानी कार्यकारी मंडल जिनमें है उन कम्युनिस्टों ने पिछले समय में की है। क्रांतिवादी मार्किसस्टों ने हड़ताल को कभी भी क्रांति का पहला पाठ नहीं माना। अन्य सभी उपायों के हारने के बाद इस्तेमाल में लाया जाने वाला एक गंभीर एवं अंतिम साधान के रूप में वे मानते हैं। लेकिन कम्युनिस्टों ने इन सभी बातों को दरकिनार कर, उनकी घोर उपेक्षा करते हुए हड़ताल को हमेशा कामगारों में असंतोष पैदा करने वाले एक दैवी प्रभावपूर्ण साधान के तौर पर इस्तेमाल किया। वे कामगारों में असंतोष पैदा कर पए या नहीं यह अलग मुद्दा है लेकिन अपनी शक्ति और सत्ता के रूप में होने वाले कामगार संगठन का अलबत्ता उन्होंने सत्यानाश कर डाला। फिलहल वे पूंजीपूति संगठनों का सहारा ढूंढने में लगे हुए हैं। ऐसे बे-मतलब आंदोलनों से इससे अधिक क्या उम्मीद की जा सकती है? आग लगाने का शौक रखने वाला आदमी जिस प्रकार आग फैलाने की कोशिश में अपने घर को सुरक्षित रखना भी भूल जाता है आज कम्युनिस्टों की हालत भी बिल्कुल वैसी ही है।
परिणामस्वरूप कामगार जिसका भरोसा कर सकें ऐसा कोई संगठन आज बचा नहीं है। मुंबई के कपड़ा मिलों में जो असंतोष फैला हुआ है मैं उसके बारे में नहीं बोल रहा हूँ। उसके बारे में जितना कम बोलो उतना बेहतर है। जी.आई.पी. रेलवे कामगार संगठन की स्थापना लेकिन 1920 में की गई। 1922 से 1924 तक यह संगठन मृतप्राय ही था। 1925 में उसका पुनरुत्थान हुआ। 1927 मेंं ‘जी.आई.पी. रेलवे मेन्स यूनियन’ नाम से एक और संगठन की स्थपना की गई। 1931 में इन दोनों संगठनों को जोड़ कर ‘रेलवे वर्कर्स यूनियन’ संस्था बनी। 1932 में इस संस्था का एक बार फिर विभाजन हुआ और ‘रेलवे लेबर यूनियन’ नामक एक और संस्था बनाई गई। 1935 में पुराने ‘जी.आई.पी. स्टाफ यूनियन’ को पुनरुज्जीवित किया गया और एक नई संस्था के रूप में उसे चालित किया गया। आज यही संस्था मान्यताप्राप्त संस्था है और रेलवे कामगारों के हितों की रक्षा करने वाले संगठनों के बीच जोरदार विरोध