118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 117

96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और शत्रुता है। कम्युनिस्ट नेता और गैर-कम्युनिस्ट रेल कामगार नेताओं के बीच नेता का पद पाने के लिए मची होड़ केये परिणाम हैं। ऐसी शत्रुता के कारण ही केंद्रीय संगठन में भी दरार आई हे। 1919 में कामगारों के केंद्रीय संगठन ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस’ की स्थापना हुई। कामगारों के सभी संगठन 1929 तक इस केंद्रीय संगठन के साथ जोड़ दिए गए थे। 1929 में नागपुर में दरार आई और कम्यूनिस्ट नेताओं का नेतृत्व मानने से इंकार करने वाले इस संगठन से अलग हुए। उन्होंने ‘नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन’ की स्थापना की। इन दो संस्थाओं के बीच घनघोर दुश्मनी पल रही है। 1931 और 1932 में इन दो संस्थाओं को जोड़ने की कोशिश की गई। लेकिन वह असफल रही। इस बारे में कोशिशें अभी भी जारी हैं। पता नहीं इसके क्या परिणाम निकलेंगे। ऐसे हालत में आपको कुछ उपदेश देना मेरे लिए बड़ा मुश्किल काम है। आपके पास अगर ऐसी संस्था चलाने के लिए लोग हों और आप अपना अलग संगठन बना लेते तब भी कुछ बुरा नहीं होता। जाहिर है कि यह एक बड़ी शर्त है। किसी भी संगठन के अगर अच्छे दिन आते हों तो उसे काम करना होगा और कोई संगठन अगर समर्थ व्यक्ति से मदद उपलब्ध कराने में अगर असफल रहता है तो वह चल नहीं सकता। क्या आप अपना संगठन चलाने के लिए ऐसे व्यक्ति को ला सकते हैं? अगर हाँ, तो आप अपना संगठन बनाएँ। बल्कि आप अगर ऐसा कर पाएँ तो वह अधिक अच्छा होगा। क्योंकि, हर संगठन का हश्र विभाजन या दुर्बलता में नहीं होता। अपने संगठन को आप समान उद्देश्यों वाले और समान कार्य करने वाले केंद्रीय संगठन के साथ जोड़ भी सकते हैं। अपना अलग संगठन अगर आप बना नहीं सकते तो आप वर्तमान किसी भी संगठन के साथ जुड़ सकते हैं। लेकिन ऐसा करते समय एक बात का ख्याल जरूर रखें कि वह संगठन कहीं अपने काम के लिए आपका गलत इस्तेमाल तो नहीं कर रहा? ऐसी संभावना होती है। मुंबई की कपड़ा मिलों में ऐसा हुआ था। वहाँ बुनकरों के हित के नाम पर बार-बार हड़ताल की जाती थी और उनकी हड़ताल में कताई वाले उनका साथ देते रहे। ऐसी बातें टालने के लिए आपको दो बातों क सहारा लेना होगा। पहली, संगठन के कार्यकारी मंडल में प्रतिनिधित्व पाने के प्रति आग्रही रहें। इससे आपसे संबंधित विषयों की तरफ संगठन का ध्यान दिलाना और समर्थन प्राप्त करना आपके लिए आसान हो जाएगा। दूसरी शर्त हो कि आपके चंदे में से कुछ हिस्सा केवल आपकी शिकायतों के निवारण के लिए आरक्षित रखे जाने की मांग आपको करनी चाहिए और उसके प्रति आग्रही होना चाहिए। अपना संगठन

खड़ा करने का निर्णय अगर आप नहीं लेते हैं और किसी अन्य संगठन में शामिल होने का निर्णय अगर आप लेते हैं तो आपको ये दो शर्तें मंजूर करवा लेनी होंगी।

कामगारों के हित में आपको संगठन बनाना चाहिए इसमें कोई दो-राय नहीं। लेकिन केवल इतना ही काफी नहीं है। राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्ति के लिए भी आपको संगठित होना पड़ेगा। सिर्फ कामगार संगठन के बल पर कामगारों के मालिकों के साथ सफलता