118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 118

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नहीं मिल सकती यह अब तक साबित हो चुका है। कामगार संगठनों को राजनीति में शामिल होना चाहिए या नहीं इस बारे में अब दो राय नहीं है। कामगार संगठनों को राजनीति में शामिल होना ही चाहिए क्योंकि सत्ता के बगैर कामगारों के हितों की रक्षा करना असंभव है। इतना ही नहीं वरन् न्यूनतम मजदूरी की दर, काम का समय, अन्य नियम आदि आम बातों में सुधार केवल संगठन के बल पर नहीं लाए जा सकते। संगठन की शक्ति को कानून की शक्ति का साथ मिलना जरूरी है। अपना संगठन बनाने के साथ-साथ देश की राजनीति में प्रवेश के बगैर यह संभव नहीं है।

राजनीति में शामिल होने के पीछे केवल कामगारों के हितों की रक्षा का ही उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अपने उद्देश्यों को कामगारों के हितों तक सीमित रखने का मतलब होगा प्राप्त कर्त्तव्यों को ही उद्देश्य मान लेना। इसका मतलब यह मान लेना होगा कि गुलामी नसीब से जुड़ी होती है और कामगार वर्ग उससे मुक्त नहीं हो सकता। उल्टे, वर्तमान मजदूर पद्धति को खत्म कर उसकी जगहर नई समता, आजादी और बंधुभाव के सिद्धांतों पर आधारित नई पद्धति की स्थापना करना आपका उद्देश्य होना चाहिए। इसका मतलब समाज की पुनःरचना और इस तरह की पुनःरचना समाज में करवाना कामगार वर्ग का प्राथमिक कर्त्तव्य है। लेकिन कामगार अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति कैसे करे? राजनीतिक शक्ति का परिणामकारी उपयोग हो तो इस दिशा में वह निश्चित रूप से एक शक्तिशाली साधन साबित होगा। फिर उन्हें राजनीतिक शक्ति प्राप्त करनी होगी। कामगार संगठनों का राजनीति से निर्लिप्त रहने का मतलब यह नहीं कि वे निजी स्तर पर राजनीति में शरीक न हों। बल्कि उनमें से कई लोग राजनीतिक सभाओं में उपस्थित रहेंगे। किसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट देंगे तो कोई हमेशा किसी राजनीतिक पार्टी में सहभागी रहेगा। कामगार संगठनों को ‘राजनीति नहीं चाहिए’ का मतलब- उस दल के सदस्यों को राजनीति नहीं चाहिए ऐसा कतई नहीं होता। ‘राजनीति मना है’ की जोखिम भरी सूचना केवल पक्ष वाली राजनीति के लिए होगा। ऐसे में हर व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार, पसंद के अनुसार राजनीति में हिस्सा ले सकती है। अगर कामगार बंधुओं के सहयोग से उनका अपना संगठन बना हो तो उसी क्षण उसे राजनीति छोड़नी पड़ेगी। अपने वर्ग के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उसे अपनी निजी ताकत को नियंत्रित कर उसे राजनीति छोड़नी पड़ेगी। इस प्रकार कामगारों का वह संगठन निश्चित रूप से पूंजीपति राजनीतिक पक्ष के लिए वरदान साबित होगा। शायद आपको पता होगा कि कामगारों की तरफ से बोलने का अधिकार बताती ट्रेड यूनियन काँग्रेस और ट्रेड यूनियन फेडरेशन ये दोनों संगठन अब एक होने की राह पर हैं। ये दोनों संगठन अब एक ही संगठन में विलीन होंगे। ट्रेड यूनियन काँग्रेस द्वारा ट्रेड यूनियन फेडरेशन का संविधान स्वीकार लिया है। और ट्रेड यूनियन फेडरेशन ने अपने नाम को त्याग देने का निर्णय लिया है। मुझे पता चला है कि इस एकता की एक शर्त विशुद्ध