98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रूप से कामगार संगठनों की तरह ही है। उसका राजनीति से कोई तालुक नहीं होगा। मैंने जब यह सुना तब मुझे लगा कि पता नहीं इस व्यक्ति को वे जो बोल रहे हैं उसका सही मतलब पता भी होगा? अपने हाथ में जो राजनीतिक शक्ति है उसका उपयोग अपने ऊपर होने वाले अन्याय को दूर करने के लिए इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगा देने की बात सचमुच खेदकारी है। इकट्ठा हुआ कामगार संगठन अगर अपनी जुटी हुई राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगी तो मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि आखिर वे इक्ट्ठा हुए तो किस लिए? छुटपुट मतभेद हों और उन्हें अगर किसी बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मिटाया जाए तो सुलह के कोई मायने भी होंगे। लेकिन अगर किसी बड़े मसले को लेकर लोगों में मतभेद हों तो उन्हें त्यागकर छोटी-छोटी बातों को स्वीकारने के लिए एकता हो तो वह एकता निरर्थक ही मानी जाएगी। इस मामले में औरों का नजरिया भले कुछ भी क्यों न हो मैं तो यही कहूंगा कि कामगार अगर संगठित होकर राजनीति से दूरी बनाएं रखने का निर्णय लेते हैं तो वह निर्णय उनके लिए अभिशाप ही साबित होगा।
इसके बाद हमें सामाजिक सुधारों की काशिशें एक ही दिशा में रखनी होगी। आज तक हम यह भूल गए थे या हमने बहुत कम कोशिशें कीं लेकिन अब हमें आर्थिक सुधारों के लिए भी कोशिश तेज करनी होगी। हमें जो अन्याय सहने पड़ते हैं उनकी जड़ एक ही है। और वह यह है कि जिनके हाथ में सामाजिक और आर्थिक शक्ति है उन्होंने कामगारों के राजनीतिक अधिकार भी छीन लिए हैं।
राजनीति में पदार्पण करने का मतलब होता है अपने पक्ष की स्थापना करना। जिस राजनीति को किसी दल का समर्थन प्राप्त न हो वह एक कल्पना की वस्तु है। रजनीति में ऐसे कई पुरुष हैं जो अपनी अलग से राजनीति चलाने या अपना चूल्हा अलग जलाने की काशिश में जुटे रहते हैं। जो रजनीतिज्ञ इस प्रकार आजाद रहने की कोशिश करता है मैं उससे बेहद चौकन्ना रहता हूँ। कोई राजनीतिज्ञ किसी से सहभागी न होने वाले स्वतंत्र व्यक्तित्व वाला हो तो किसी भी राजनीतिक उद्देश्य प्राप्ति के लिए वह अनुपयोगी होता है। वह कुछ भी हासिल नहीं कर सकता। अपनी अकेली कोशिश से वह घास की फसल भी उगा नहीं सकता। लेकिन स्वतंत्रता की लालसा रखने वाले राजनीतिज्ञ अपनी बौद्धिक ईमानदारी के कारण स्वतंत्र नहीं रहना चाहते वरन् अधिक से अधिक मांगें मनवाने के लिए वे अलग रहते हैं। इसलिए दल के अनुशासन से वे अलग रहना चाहते हैं। जो हो, हालांकि राजनीति में पृथक रहने वाले कई राजनीतिज्ञों के बारे में मेरा यही अनुभव है। लेकिन बिना पक्ष के सच्ची और अभावपूर्ण राजनीति हो ही नहीं सकती।
फिर सवाल यह उठता है कि हम किस पक्ष में शामिल हों? कई पर्यायी पक्ष हैं। काँग्रेस में क्या आपको शामिल होना चाहिए? वह कामगारों को उनके लक्ष्यों की प्राप्ति में क्या मददगार साबित हो सकती है? आपको यह राय देने में मुझे बिल्कुल हिचक नहीं