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महसूस होती कि कामगारों को काँग्रेस से पृथक अपना पक्ष बना लेना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मेरे इस कथन के लिए कामगार नेताओं का विरोध है। असल में सोशलिस्टों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक गुट है काँग्रेस और समाजवाद की पूर्तता के लिए वे कामगार संगठन अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। लेकिन वे चाहते हैं कि यह संगठन काँग्रेस में ही बना रहे। श्री राय के नेतृत्व में कार्यरत और अपने को कम्युनिस्ट कहलाने वाला एक गुट है। कामगारों के किसी भी अन्य संगठन के लिए उनका जोरदार विरोध है। फिर वह संगठन काँग्रेस का अंदरूनी हो या कोई बाहरी संगठन हो। मैं इन दोनों गुटों से पूरी तरह असहमत हूँ। मुझे श्री रॉय जिस प्रकार एक पहेली लगते हैं उसी प्रकार वे औरों को भी लगते होंगे। कोई कम्युनिस्ट जो कामगार संगठन का विरोधक है। ये शब्द अपने आप में विरोधी हैं। इस नजरिए को लेकर अपनी कबर में लेनिन भी छटपटा जाएगा। इस अजीब नजरिए का केवल एक ही स्पष्टीकरण हो सकता है और वह ये है कि श्री रॉय को शायद लगता है कि भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण लक्ष्य है, साम्राज्यवाद का अंत करना। श्री रॉय ने जो नजरिया स्वीकारा है उसका कोई दूसरा मतलब नहीं निकल सकता। साम्राज्यवाद के नष्ट होते ही मानों भारत के सभी पूंजीपतियों के हितसंबंध अगर खत्म होने वाले हों तभी यह राय सही साबित हो सकती है। लेकिन अंग्रेजों के चले जाने के बाद इस देश में जमींदार, मिल-मालिक और साहूकार हमेशा रहेंगे और वे लोगों का शोषण करते रहेंगे। साम्राज्यवाद के खत्म होने के बाद भी आज की तरह ही कामगारों को इन पूंजीपतियों के साथ संघर्ष करना ही पड़ेगा और यह समझने के लिए आदमी के पास बहुत अधिक चातुरी होना जरूरी नहीं है। अगर ऐसा ही है तो क्यों न कामगार अभी से इक्ट्ठा हों? संगठन को बढ़ाने से वे क्यों कतराएं? मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। कांग्रेस साम्राज्यवादियों को पूरी तरह पता है कि कामगारों को साम्राज्यवाद की तरह ही पूंजीवाद से भी संघर्ष करना पड़ेगा। इसीलिए कामगारों को संगठित होना पड़ेगा। वे यह जानते हैं। लेकिन उनकी यह शर्त है कि हर कामगार संगठन काँग्रेस के ही तहत होना चाहिए। काँग्रेस और कामगारों के इस जबरदस्ती के समझौते की आवश्यकता अथवा मूल्य मुझे जरूरी नहीं लगता। काँग्रेस सोशलिस्टों के कथनानुसार देश में समाजवाद लाना उनका लक्ष्य है। वे समाजवाद कैसे लाने वाले हैं? काँग्रेस का दाहिना हाथ बन कर। काँग्रेस से अलग न होने की यही वजह वे बताते हैं। इंसानी स्वभाव के बारे में उनका ज्ञान इतना दयनीय है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। उनका उद्देश्य अगर समाजवाद लाना ही है तो इस बारे मं लागों को उपदेश देकर उन्हें वांछित कार्य के लिए संगठित करना जरूरी है। उच्च वर्णियों से बिनती कर समाजवाद नहीं आ सकता। काँग्रेस के महत्वपूर्ण लोगों को साम्राज्यवाद का ‘स’ भी सहा नहीं जाएगा। वास्तविकता यही होने के कारण वह दिनों-दिन ज्यादा से ज्यादा उजागर होती जा रही है। पिछले वर्ष पंडित नेहरू ने समाजवाद का तूफानी आंदोलन खड़ा किया था। लेकिन उस बेचारे को जल्द ही सीधा कर दिया गया किसी बदमाश बच्चे को