118 12/13.2.1938 आजादी, समता, बंधुभाव पर आधारित नई पद्धति श्रमिक संगठनों का लक्ष्य हो - मानमाड़ - Page 122

101

कि आज स्वतंत्र लेबर पार्टी नहीं है और केवल मुंबई इलाके तक ही सीमित है, लेकिन यह बात उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जा सकती। हर दल का कोई न कोई शुरूआती समय होता ही है। कोई पक्ष कितना पुराना है यह महत्वपूर्ण बात नहीं है, वह किन सिद्धांतों को मानता है, क्या हासिल कर सकता है और उसकी सुप्त शक्ति क्या है ये बातें महत्वपूर्ण होती हैं। स्वतंत्र लेबर पार्टी का घोषणापत्र पढ़ने का कष्ट जो करेंगे उन्हें पता चलेगा कि यह पार्टी किन सिद्धांतों को मानती है अैर क्या हासिल कर सकती है। जाहिर है कि इस पार्टी में बहुत बड़ी सुप्त शक्ति है। यह पक्ष सीमित नहीं है। वह जाति या पंथ की सीमाओं से पटे सबके लिए खुला है। उसका कार्यक्रम भले दलित वर्ग की जरूरतों पर केंद्रित हो लेकिन समूचे कामगार वर्ग की जरूरतों की समा लेने की विस्तृत क्षमता उसमें है। इस स्वतंत्र लेबर पार्टी की तरक्की के आड़े राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक अड़चन आ रही है। इस पक्ष के केंद्र में आज दलित वर्ग के लोग हैं। यही वास्तविकता खासकर इस दल की तरक्की और विस्तार के आड़े आ रही है। दलित वर्ग जैसे हीन दर्जे के लोगों के साथ सहयोग न करने की आम भावना है। इसी भावना ने उच्च वर्ग के हिंदुओं को स्वतंत्र लेबर पाटी्र में शामिल होने से रोका हुआ है। और जो लोग इस पक्ष की खामियाँ ढूंढ़ते रहते हैं, वे उनकी इस भावना का फायदा उठाते हुए अजामी और धर्मभीरू लोगों को इस पार्टी में शामिल होने से रोक रहे हैं। लेकिन स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्वच्छ और ईमानदार राजनीति समूचे कामगार वर्ग को अपने झंडे के नीचे खींच लाने में लौहचुंबक की तरह उपयोगी साबित होगी और मुझे यकीन है कि हिंदु समाज रचना के कारण निर्मित विरोधी ताकतों की शक्ति के लिए प्रतिकारक शक्ति साबित होगी। अब तक ठाणे, कुलबा और रत्नागिरी- इन तीन जिलों में पक्ष पास की स्थापना का काम पूरा हो चुका है। इन इलाकों के किसानों और कामगारों के बीच उसने अपनी छाप छोड़ रखी है। उन्हीं से इस पक्ष से नींव बनी है। इन प्रांतों के अन्य हिस्सों में भी जोर-शोर से उसका प्रचार-कार्य जारी है। मध्य प्रांत और वन्हाड में भी यह पक्ष कार्यरत है। मुझे उम्मीद है कि भारत के अन्य प्रांतों में भी वह अपनी जगह पा लेगी। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कामगार वर्ग का न्यायपूर्ण समर्थन प्राप्त करने के लिए पृथक मजदूर पक्ष का ही विकल्प उपलब्ध है।

कामगार संगठनों में शामिल दलित वर्ग के लोग भारत के समूचे कामगार वर्ग को प्रेरित कर सकते हैं। इंग्लैड के चार्टिस्ट आंदोलन का अध्ययन करने वाले गैमेज ने कहा है, ‘‘सामाजिक सवालों के सहारे के बगैर आज तक कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं हुआ है। ऐसा हो ही नहीं सकता। मानव जाति के जीवन का प्रमुख लक्ष्य है सामाजिक उपभोग की वस्तुएं हासिल करना। इन साधनों की मालिकियत अगर उन्हें मिले तो राजनीतिक उठापटक में शारिक होने की उनकी मानसिकता बेहद कम हो जाती है। आम आदमी को राजनीतिक अधिकारों का महत्व बताने का काम सामाजिक दोषों के जरिए ही होता है।’’ आपके साथ जुड़े सामाजिक दोष बड़े भी हैं और वास्तव भी हैं। इस कारण आपकी राजनीति भी खालिस और वास्तव