104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिला युवक संघ के तत्वावधान में होगी। लेकिन फिर मतभेद हुए। सके बवजूद अपने मतों पर अड़े रहने के बजाय परिषद् होनी चाहिए, भले किसी की तरफ से ही आयोजित क्यों न हो सोचकर उदात्त भावना के साथ उन्होंने परिषद् का आयोजन किया यह बात अभिनंदनीय जरूर है। सार्वजनिक काम करने वालों में या करने की इच्छा पालने वालों में यह भावना अगर नहीं होगी तो उनके हाथों कोई काम नहीं होगा। इसलिए सार्वजनिक काम करने वालों को और करने की इच्छा पालने वालों को हमेशा अपने मन में ऐसा भाव जगाए रखना है, उसी में समाज का हित है। युवक संघ द्वारा उपस्थित किए गए इस प्रशंसा योग्य और अनुकरणीय काम के लिए मैं एक बार फिर उनका अभिनंदन करता हूँ।
युवाओं की परिषद् में मुझे जो बताना है उस मैं पुस्तक रूप में प्रकाशित करना चाहता था। इसके बावजूद, काम की बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण अभी तक वह संभव नहीं हो पाया है। फिर भी जल्द ही इसे मैं पुस्तक रूप में प्रकाशित करूँगा। आज के इस अवसर पर मैं यहाँ केवल एक-दो महत्वपूर्ण बातें बताना चाहता हूँ। उम्र के चालीस वर्ष मैंने पार किए हैं सो मैं पहले ही कबूल चुका हूँ कि मैं युवक नहीं हूँ। इंसान को अपने जीवन में खाने-पीने और जीने को ही जीवन के अंतिम उद्देश्य नहीं मानने चाहिए। जिंदा रहने के लिए खाना-पीना चाहिए और जीना सम्मानपूर्ण और समाज को किस पर नाज हो इस प्रकार समाज सेवा का होना चाहिए। भर-पेट खाना और इस धरती पर भार होकर जीना - इस प्रकार का जीवन रहे या न रहे एक ही बात है। इस संदर्भ में मशहूर नाटककार स्व. गडकरी एक जगह कहते हैं- ‘‘समाज में जब तक हमारी इज्जत है तभी तक जीने में गर्व है।’’ वरना समाज के लिए अप्रिय बन कर, बूढ़े बन कर, बिस्तर पर ही लेटे-लेटे, बहू-बेटों के तिरस्कार के लिए पात्र बन कर घिस-घिस कर जीने से बेहतर है हट्टे-कट्टे रहते हुए ही मौत आ जाए।
जब मैं युवा था तभी एक-दो महत्वपूर्ण उदाहरण मैं आपको बतना चाहता हूँ युवाओं को चाहिए कि वे हमेशा उदात्त लक्ष्य पालें। युवाओं को एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि काई भी अच्छी बात हासिल करने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। ‘तप के अंत में फल मिलता है’ वाली कहावत इसी कारण रूढ़ हुई है। कार्य आत्मोन्नति का हो या राष्ट्रोन्नति का उसके लिए लगातार कोशिश करते रहना पड़ता है। उस कार्य के लिए व्यक्ति अपने आपको समर्पित करे। मैंने कई आधुनिक युवा देखे हैं जो लगातर 15 मिनट एक जगह बैठ नहीं सकते। पल-पल उन्हें बीड़ी सुलगानी पड़ती है। उन्हें चाय पीनी पड़ती है। उसके बगैर वे काम ही नहीं कर सकते। यह सही नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपनी जन्मजात बुद्धि के सहारे उन्नति नहीं कर सकता। पागल व्यक्ति दुनिया में बहुत कम ही पैदा होते हैं। बुद्धि को विकसित करना हरेक के बस की बात है। 24 में से 20