119 12.2.1938 शील और सौजन्य के अभाव में शिक्षित व्यक्ति हिस्र पशु से भी क्रूर और डरावना होता है - मनमाड - Page 127

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उसे इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है। हथियार से इंसान अबलाओं की रक्षा कर सकता है। अच्छे व्यक्ति के हाथ में हथियार का होना अच्छा होता है लेकिन बुरे आदमी के हाथ में हथियार होना अच्छी बात नहीं। शिक्षित व्यक्ति में अगर शील और सौजन्य का अभाव हो तो उसे हिंस्त्र पशु से अधिक क्रूर और डरावना मानना चाहिए। अज्ञानी जनता दांव-पेंच लड़ाना नहीं जानती। पढ़े-लिखों के पास ही वे होते हैं। अगर किसी के पास सोच है तो कई लोग अपनी शिक्षा के सहारे उसे कैसे घेरें और मुश्किल में फंसाएँ इसी कोशिश में लगे रहते हैं। दीन-दुर्बल, गरीब किसानों के पास शिक्षा नहीं, इसीलिए उनके अज्ञान का फायदा पढ़े-लिखे, सेठ, ब्राह्मण, वकील आदि सब लोग दब रहे हैं। गरीब लोगों को लूटने, मुश्किल में डालने के लिए ही अगर शिक्षा का उपयोग होना हो तो ऐसी शिक्षा को धिक्कार है। इसकी तुलना में शील का बड़ा महत्व है। आजकल के युवाओं में धर्म के प्रति उदासीनता है। वे कहते है धर्म गांजा है। लेकिन मुझमें जो अच्छी बातें हैं और मेरी शिक्षा का जनता के लिए जा भी उपयोग हुआ हो वह सब मेरे अंदर बसी धार्मिक भावना के कारण ही हुआ है। मैं धर्म चाहता हूँ लेकिन धर्म का ढोंग नहीं चाहता। हिंदू धर्म नर्क है यह मेरा मानना अभी भी कायम है। सो, मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि शिक्षा से अधिक शील का महत्व दें। साथ ही, अपनी शिक्षा को प्रयोग केवल अपनी दीन-दुर्बल जनता के उद्धार के लिए न करते हुए केवल ‘अपनी नौकरी भली और अपना परिवार भला’ की भावना के साथ बरतेंगे तो समाज को उनकी शिक्षा से लाभ ही क्या? युवकों पर आज जो जिम्मेदारी है उसे पहचान कर उन्हें इस काम में लग जाना चाहिए। जनता के हाड तक डर पैठ गया, दिखाई देता है। अपने कानूनी हक लेने के लिए भी वे साहस के साथ आगे नहीं आते। सार्वजनिक कुओं पर पानी भरना, सार्वजनिक सड़कों पर जुलूस निकालना आदि बातें डर के कारण वे नहीं करते। केवल युवा ही इन हालात को बदल सकते हैं। लेकिन पहले उन्हें इस काम के लिए तैयार होना पड़ेगा। इसके लिए वे प्राणयज्ञ दल संस्थाओं की जगह-जगह स्थापना करें। प्रकृति प्रदत्त हक पाने के लिए उन्हें जारदार लड़ाइयाँ लड़नी होंगी। इस संदर्भ में एक मनोरंजक और बोधपूर्ण पौराणिक कहानी मुझे याद आई। उसे बता कर मैं अपना भाषण पूरा करता हूँ।

द्रोण बहुत गरीब था। वह अमीरों की बस्ती में रहता था। उसका अश्वत्थामा नामक एक बेटा था। बस्ती के अन्य बच्चों का सोने की कटोरी से दूध पीते हुए देख कर उसने भी। *

* ख्., भाषण के इससे अगले हिस्से वाला अंक उपलब्ध नहीं हो पाया-संपादक