114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बारे में जो तथ्य हमारे सामने आए हैं उनमें ऐसी कोई जानकारी नहीं है। इसलिए ऐसा कोई अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। तीसरी वजह संभवतः यह बताई जा सकती है कि उपयुक्त न्यायालय में उन्हें अपील करना था। इस बारे में जो भी कहना हो वह सभी जानते हैं, गृहमंत्री मुझसे अच्छे तरीके से जानते होंगे। वह मुझसे भी बढ़े वकील हैं। वे जानते हैं कि प्रीवी कौंसिल द्वारा सैंकड़ों में नियम बना दिया है कि यह साबित किए बगैर कि न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है हिंदुस्तान के क्रिमिनल कोर्ट के बारे में की गई अपील को स्वीकार नहीं किया जाएगा। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड का सामान्य धाराओं के भंग होने से संबंधित मामलों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। अपनी न्यायबुद्धि के अनुसार प्रीवी कौंसिल द्वारा क्रिमिनल अपील स्वीकारने से संबंधित अपना अधिकार क्षेत्र बेहद सीमित कर रखा है। प्रस्तुत मुकदमे के बारे में कहना हो तो जिस प्रेसिडेंसी मैजिस्ट्रेट अथवा जिनके सामने अपील प्रस्तुत की जाती है उस हाईकोर्ट- दोनों में से किसी एक के द्वारा क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की किसी धारा का अथवा सामान्य न्याय संबंधी सिद्धांतों का कहीं भंग हुआ हो ऐसा भी नहीं है। इस मामले में घास के तिनके जितना सबूत भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में, इन लोगों की दी गई सजा को स्थगित करने लायक कोई सबूत गृहमंत्री को मिला हो ऐसा मुझे नहीं लगता। वास्तविक स्थितियों पर गौर करने से मुझे कोई ऐसा सबूत दिखाई नहीं दे रहा है।
इसी प्रकार मेरी जानकारी के अनुसार आम अपराधियों को सुनाई गई सजा को इससे पूर्व किसी गृहमंत्री द्वारा मुल्तवी किए जाने का एक भी उदाहरण मुझे नहीं मिल रहा। प्रांत के सर्वश्रेष्ठ न्यायमंडल द्वारा न्यायबुद्धि के साथ दी गई सजा को स्थगित करने के लिए बीमारी या अन्य निजी मुश्किलें आदि को अब तक किसी कोर्ट द्वारा स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। इसलिए, हाईकोर्ट की राय की प्रवाह किए बगैर उसके द्वारा सुनाई गई सजा को रोकने के मामले से संबंधित अगर कोई ठोस सबूत सामने नहीं आए तो मुझे कहना पड़ेगा कि जो भी हुआ वह बेहद निषेधाई, नाम बदनाम करने वाला हुआ। हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से जिन्होंने काम देखा उन वकील के द्वारा अर्जी दी गई थी कि इन क़ैदियों को कारागार में विशेष रियायतें मिलें, उनके साथ दूसरी श्रेणी के क़ैदियों-सा सलूक किया जाए। यह बात गृहमंत्री भी जानते हैं। कम से कम, हमें अखबारों के जरिए इस बात का पता चल ही चुका है। मुझे एक और बात का भी पता चला है कि आरोपियों के हाईकोर्ट के वकील द्वारा एक और बात की अर्जी हाईकोर्ट में दी थी कि आरोपियों की सजा को तात्कालिक रूप से मुल्तवी किया जाए। कोर्ट ने ये दोनों अर्जियाँ खारिज कर दी थीं। लेकिन यही दो अर्जियाँ या उनमें से एक अर्जी को गृहमंत्री ने स्वीकार किया है। ऐसा कर गृहमंत्री द्वारा जो अपराध किया गया है उससे अधिक कानून और व्यवस्था के प्रति उपेक्षा पैदा करने का कोई और काम इतने असरदार तरीके से शायद किसी ने ना किया हो। अपनी राय स्पष्टता के साथा व्यक्त करने में मुझे